12.11.17

An Analysis of Inflation in India

(I am conscious that Economics is not my subject, so I probably shouldn't analyze inflation in India. I nevertheless decided to go a bit deeper and analyze as a layman because I won't learn unless I decide to write. In the process of writing this blog, I did learn quite a few things about economics, and especially inflation. That is the satisfaction I will carry!)

My personal experience is that the prices in India have been mostly stable in last 3-4 years, except some seasonal spikes. The spikes do happen, for example tomato and onion prices. However, these spikes are short lived, and the prices invariably come down after few days.

There was a time of high inflation. Every few months, there was an upward revision of prices. It was very visible even to the well-to-do families like ours. For example, after every few months, milk price was being revised until around 2014. The prices still increased after 2014, but at a much slower pace.
See following figures for an example:
 a. Full cream milk price was increased to 52 Rs/litre in March 2017
 b. Same full cream milk was priced at 48 Rs/litre in May 2014 (See here)
 c. The price of full cream got almost doubled in 5 years. It was 25 Rs/litre in July 2009 (See here)

Milk is just an example which impacts me, you and everyone around us. The price increased 92% in 5 years before 2014, and it increased 8% in 3 years after 2014!

Now, let us look at the overall inflation trend. We will look at annual inflation rate based on CPI (Consumer Price Index) and not WPI (Wholesale Price Index) because we are impacted more by CPI.

Annual Rate of Inflation: This is the % change in CPI over a period on one year.

(Source: www.inflation.eu. Click here for direct link)

Analysis of the inflation trend:
Inflation is driven by multiple factors. E.g. natural (like monsoon, hailstorms, etc), global factors (like oil prices, global demand), domestic policy (e.g. RBI controlled interest rates, government controlled import/export policies, taxation, law and order situation, etc).

Now looking at the numbers of last 20 years:
- 1998 was a particularly bad year for inflation. That was the era of political instability and several economic sanctions were applied by international community because of nuclear tests carried out by India. 15.32% inflation is too high by any standards!
- 1999 was the year of Kargil war. But still the inflation rate came down to benign 0.47%.
- Between 1999 and 2004, the inflation stayed between 3.5% and 5%. This is quite a healthy rate, as most economists will tell. This is the era of Atal Bihari Vajpayee.
- After 2004, there was a steady increase in inflation. By 2009, inflation increased to 15% once again. I remember when I returned to India in 2009 after 2 years of stay in UK, I was shocked to see the prices of essentials like lentils. These were costlier in India than in UK.
- From 2009 to Dec 2013, the inflation stayed high (around 10%) except a small dip in 2011 to 6.5%. For people like me, inflation was not just a number published in newspaper, the pinch of mahangaai was to be experienced in daily life.
- Starting Dec 2014 figures, the inflation figures have steadily come down . From 9% in Dec'2013, it came down to 6% in Dec'2014 and Dec'2015. Then onwards it is around 2-3%.

Government's role in controlling inflation after 2014:
Soon after Modi's famous victory in May'2014, most commentators found taming of inflation as one of the most difficult tasks for Modi government (see this and this). Inflation was indeed a major election issue as was corruption, so government must deliver it soon after assuming power.

While softening of oil prices did help Indian people, government also did its bit.

1. Raids against hoarding: Soon after assuming power, Modi government nudged state governments to raid hoarders. Some friendly state governments did cooperate and that was a shot in the arm to tame inflation of some essential commodities. This has continued over last 3+ years. No artificial shortage of essential commodities has been allowed. (References: 1, 2, 3, 4, 5). This is something which was missing in UPA era (except some selective raids under public pressure).

2. Use Imports and Exports to keep prices stable: Modi government has taken proactive steps to keep prices stable. That means if there is a surplus in India, government promoted exports. Similarly, if a shortage is envisaged, the government used imports to ensure there are enough supplies available. (Reference: 1, 2, 3)

3. Setting up of Inflation Target: As a major monetary policy reform in 2016, an inflation target was set for next 5 years in the range of 4-6% with a tolerance band of 2%. This reinforced the commitment government is showing towards maintaining a balance between inflation and growth. (See this)

Conclusion: Modi government has shown commitment to tame inflation so far. Now that oil prices are increasing, there may be an increase in prices of day-to-day use items. Government will need to stay on course. As a citizen, I iterate my satisfaction.

So far, so good :-)

17.6.11

मेरी हरिद्वार यात्रा

रविवार (१२ जून) को जब मैंने पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार में प्रवेश किया तो मन में स्वामी रामदेव के स्वास्थ्य को लेकर चिंता तो थी, पर साथ ही यह कामना भी थी की रामदेव जी (एक संन्यासी) ने इस अनशन को "आमरण अनशन" कहा है तो इस अनशन को तब तक समाप्त नहीं करना चाहिए जब तक सब मांगे मान नहीं ली जाती. इन दो विरोधाभासी विचारों के बीच ही मन कह रहा था कि बाबा रामदेव आज अनशन तोड़ देंगे, जिसका भरोसा श्री श्री रविशंकर एक दिन पहले जता चुके थे.

मेरे लिए हरिद्वार जाना एक महत्त्वपूर्ण निर्णय था. TCS में अपने काम को छोड़ कर निकलना मेरे बॉस राजेश ने कुछ आसान बना दिया, क्योंकि राजेश स्वयं एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं तथा दुनिया में चल रहे विभिन्न आन्दोलनों के प्रति अपना वैयक्तिक मत रखते हैं. मैंने जब हरिद्वार जाने का फैसला किया तो मुझे नहीं मालूम था कि यह आन्दोलन कितना लम्बा चलेगा, परन्तु मेरा निश्चय था कि विजय मिलने से पहले लौटूंगा नहीं. मेरी पत्नी आभा मेरे लम्बे समय तक आन्दोलन से जुड़ने के पक्ष में नहीं थी और मेरे पिताजी तो एक दिन के लिए भी जुड़ना परिवार व TCS के प्रति गैरजिम्मेदारी व बेवकूफी भरा निर्णय बता रहे थे. खैर, मैं पतंजलि योगपीठ पहुँच चुका था और उम्मीद कर रहा था कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध यह आन्दोलन भारत के लिए एक एतिहासिक क्षण ला पायेगा.

योगपीठ में यज्ञशाला नामक स्थान पर आन्दोलनकारियों व मीडियाकर्मियों के बैठने की व्यवस्था की गयी थी. कुल ५०-६० लोग रहे होंगे, जो टीवी के माध्यम से आन्दोलन की खबरें पा रहे थे. मेरे ख्याल से आन्दोलन के नेताओं को आन्दोलनकारियों से सीधा संवाद स्थापित करना चाहिए था. अनशन टूटने की खबर भी वहां टीवी के माध्यम से ही पहुंची, जो कि मेरी हरिद्वार यात्रा की पहली बड़ी निराशा थी. अनशन टूटना स्वयं एक बढ़ी निराशा थी ही.

खैर मुझे कुल मिला कर अपना हरिद्वार आना व्यर्थ लगा क्योंकि मैं समझ चुका था कि यह आन्दोलन अब कुछ समय के लिए तो अपनी ऊर्जा खो ही देगा. तभी मैंने अपने बॉस राजेश को इस आशय का सन्देश भेजा कि मेरी वापसी जल्द ही होगी. दोपहर के भोजन के बाद मैंने कईं कार्यकर्ताओं से बात कि और दो प्रश्न पूछे - (१) अनशन टूटने के बाद अब इस सत्याग्रह का अगला कदम क्या होगा?, (२) मैं आन्दोलन में योगदान देना चाहता हूँ, इसलिए मुझे स्वयंसेवकों के दल में शामिल होने के लिए क्या करना होगा? स्वयंसेवक के तौर पर मैंने सफाई से लेकर कंप्यूटर के किसी काम को करने के लिए अपनी तैयारी दिखाई. दोनों में से किसी भी प्रश्न का जवाब संतोषजनक नहीं मिला. मुझे आचार्य जी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के लौटने तक इंतज़ार करने कि सलाह दी गयी और खाली बैठने को कहा. शाम को आखिरकार अपने प्रयास में मुझे थोड़ी सफलता मिली जब मुझे यज्ञशाला के निकट कुर्सियां तरतीब से लगाने का काम दिया गया.

किसी को मालूम नहीं था कि स्वामी जी कब लौटेंगे, पर सब इंतज़ार कर रहे थे. योगपीठ के अन्य सब काम तथा आयुर्वेदिक अस्पताल अपना नियमित काम कर ही रहे थे. सोमवार का सारा समय इस इंतज़ार में बीता कि शायद स्वामी जी आ ही जाएँ. स्टार न्यूज़ के एक व्यक्ति से बात करके पता चला कि स्वामी जी के अगले दिन सुबह ही आने कि संभावना है. स्वयंसेवा के लिए कोई मौका न देख कर मैंने पुस्तकालय में २ घंटे बिताये. योगपीठ का पुस्तकालय काफी समृद्ध है और विशेषतः हिंदी भाषा की पुस्तकों की अच्छी collection है. उन पुस्तकों को देख कर अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गौरव का एहसास हुआ तथा मन किया की वहां बैठ कर गंभीर अध्ययन करूं. लेकिन मैं जानता था कि अध्ययन का मौका अभी नहीं है.

शाम को मुझे योगपीठ के फेस २ में राजीव भवन जाकर विनोद जी से मिलने को कहा गया. विनोद जी शायद सूचना तकनीकी के लिए वहां कुछ setup कर रहे हैं और मेरी पृष्ठभूमि को देखते हुए शायद यह सोचा गया होगा कि मैं वहां कुछ स्वयंसेवा कर सकूंगा. मैं तुरंत राजीव भवन पहुंचा, जो कि भारत स्वाभिमान के श्री राजीव दीक्षित कि पावन स्मृति में बनाया गया है. ये वही राजीव दीक्षित हैं, जिनके भाषणों को सुनने के लिए १९९८-९९ में हम मुंबई में घूमते थे और जिनकी राष्ट्रनिष्ठा और देशभक्ति से प्रेरणा पाते थे. विनोद जी से जब मैं मिला तो मैंने पाया कि उनके पास मुझे देने को कोई काम नहीं है. शाम का समय था, इसलिए उन्होंने कहा कि अगले दिन सुबह वो मुझे कुछ बता सकेंगे. मैंने कहा कि मैं रात को भी जो काम बोलेंगे, वो करने को तैयार हूँ, पर विनोद जी ने कहा कि अभी वो एक आवश्यक बैठक के लिए निकल रहे हैं, इसलिए सुबह ही बता पायेंगे. मैंने उनसे एक प्रार्थना और की कि भारत स्वाभिमान "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के मुद्दे पर जो कुछ काम कर रही है, मुझे उसकी जानकारी चाहिए. विनोद जी ने अगले दिन सुबह ९ बजे से पहले मुझे फोन पर बात करके दिशा दिखाने का भरोसा जताया और मेरा फोन नंबर ले लिया.

अगले दिन सुबह मुझे कोई फोन नहीं आया. पता लगा कि स्वामी जी हरिद्वार लौट आये हैं और ११:३० बजे के करीब दर्शन देंगे. मैं तुरंत यज्ञशाला पहुंचा कि शायद सत्याग्रह की भावी दिशा का पता लग सकेगा. वहां उस समय लगभग ४००-५०० लोग थे, तभी सूचना जारी हुई कि स्वामी जी अस्पताल के OPD हॉल में दर्शन देंगे. सुब लोग यज्ञशाला से निकल कर OPD हॉल में पहुंचे; मैं भी पहुंचा. इस पूरे समय में मैंने देखा कि यज्ञशाला के आसपास का जो तामझाम (टेंट, कुर्सियां, इत्यादि) था, उसे उठवाया जा रहा है. बाबा रामदेव कि प्रतीक्षा में हम बैठे थे, जब मंच से किसी ने घोषणा की कि सत्याग्रह जारी रहेगा और सब लोग अपने-अपने जिलों में लौट कर वहीँ से सत्याग्रह में भाग लें.

कोई १ घंटे की प्रतीक्षा के बाद स्वामी रामदेव पहुंचे. मैंने पहली बार उन्हें प्रत्यक्ष देखा था. शरीर से कमजोर, लेकिन चुस्त. चेहरे पर शांति व सौम्यता विराजमान थी. मंच पर पहुँच कर उन्होंने कुछ वरिष्ठ संतों के चरण छुए. कुछ अन्य संतों ने स्वामी जी के चरण छुए. स्वामी जी पर पुष्पवर्षा की गयी, और कार्यकर्ताओं ने "भारत माता की जय" और "वन्दे मातरम्" के नारों से माहौल गुंजा दिया. बिना कोई शब्द बोले स्वामी जी मंच से चले गए.

मुझे अभी भी सत्याग्रह की भावी दिशा का पता नहीं चला था. मैं वहां पहुंचा जहां से मीडिया के लोग रिपोर्ट कर रहे थे. कुछ लोगों में कैमरे के सामने खड़े होने की लालसा देखी, पर मैं दूर खड़ा हो कर सुनने की कोशिश कर रहा था कि क्या बताया जा रहा है. पता लगा कि सत्याग्रह को लेकर भ्रम की स्थिति है और ऐसी अफवाहें उड़ रही हैं कि स्वामी जी ने ८-१० दिन का मौन धारण किया है. मेरी इच्छा थी कि मैं मीडिया से पूछूं कि वो इस आन्दोलन के मुद्दों पर चर्चा करने की बजाय इस पर ध्यान क्यों लगा रहे हैं कि बाबा के पीछे कौन है, पर मैं अपने स्वयं के संकोच के कारण यह पूछ न पाया.

वहां से निपटने के बाद लगभग २ बजे मुझे एक ब्रह्मचारी मिले, जिन्होंने अपना जीवन बाबा की सेवा में समर्पित कर दिया है. उन्होंने बताया कि ऐसे लगभग १५० युवक-युवतियां हैं जिन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहते हुए भारत स्वाभिमान का काम करने की कसम खाई है. उन ब्रह्मचारी को जब मैंने बताया कि मुझे कुछ दिनों से सत्याग्रह की कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है, तो उन्होंने खेद प्रकट किया और कहा कि ऐसी व्यवस्था नहीं की जा सकी, जिस से मुझ जैसे लोगों को मार्गदर्शन दिया जा सके. "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के विषय में उनका कहना था कि सरकार को ही इस दिशा में पहल करनी होगी (जिस के बारे में मेरा मत कुछ भिन्न है). उन्होंने अपने एक सहयोगी को कहा कि मुझे स्वामी मुक्तानंद से मिलवा दे. उनके सहयोगी थोडा घबराये, जिस से मैंने अंदाजा लगाया कि स्वामी मुक्तानंद जी शायद काफी वरिष्ठ हैं. मैं उनके साथ स्वामी मुक्तानंद कि खोज में निकला. थोड़ी देर में भगवे वस्त्रों में एक स्वामी मिले, जो सब कार्यकर्ताओं को योगपीठ के फेस २ में जाने को कह रहे थे. बाद में पता चला कि वही स्वामी मुक्तानंद थे. मैं फटाफट से खाना खाकर फेस-२ में पहुंचा, इस उम्मीद में कि सब से वहीँ पर मुलाकात होगी. परन्तु दुर्भाग्य से मुझे फेस-२ में कोई नहीं दिखाई दिया. मैं राजीव भवन में जाकर बैठ गया तो वहीँ विनोद जी मिल गए. मैंने शालीनतावश उनसे सुबह ९ बजे फोन न करने का तकाजा नहीं किया, पर यह जरूर कहा कि "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के विषय पर स्पष्टता मिलने से पहले मैं वहां से नहीं लौटूंगा.

विनोद जी मुझे डॉ जयदीप आर्य के कार्यालय में ले गए. डॉ आर्य बाबा के बहुत नजदीकी सहयोगी हैं और मुझे विश्वास था कि वो मेरी सहायता अवश्य करेंगे. लेकिन उनके कार्यालय में एक अन्य सज्जन दिलीप जी बैठे थे, जो शायद कार्यालय को संभालने का काम करते हैं. वो स्वयं भी एक वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं. मैंने उनको अपनी सारी रामकहानी सुनायी, जो उन्होंने कुछ रूचि से व कुछ अरुचि से सुनी. उन्होंने भी यही कहा कि "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के लिए सरकार को ही पहल करनी होगी. उसके बिना वो चाह कर भी कुछ नहीं कर सकेंगे. मैंने कहा कि जनता एवं भारत स्वाभिमान जैसे संगठन भी काफी कुछ कर सकते हैं, इसलिए सरकार के कुछ करने कि "प्रतीक्षा" करना शायद ठीक नहीं होगा, जैसे (१) अंग्रेजी को दिए जाने वाले स्पेशल treatment की खबरों को जनता तक ले जाना, (२) हिंदी में नए शब्द रचना, (३) हिंदी माध्यम में इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करने की दिशा गंभीर पहल करना, ये कुछ काम तुरंत शुरू किये जा सकते हैं. दिलीप जी ने मुझे लिखित में एक प्रोपोसल देने का सुझाव दिया और कहा कि मैं इसे डॉ आर्य को सीधे भेज सकता हूँ. डॉ आर्य से मिलने के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि वो स्वामी जी के साथ हैं क्योंकि बहुत से लोग मिलने आये हुए हैं.

इस बैठक के बाद Action point मेरे पास था - मुझे लिखित में एक प्रोपोसल भेजना है, जिसके लिए मुझे कुछ समय लगेगा. मैंने हरिद्वार से लौट कर इस पर काम करने का निश्चय किया. इस पूरी यात्रा में कईं बातें सीखी -
(१) एक संगठन के नेतृत्व और उसके साधारण कार्यकर्ताओं के बीच में सीधा संवाद स्थापित होना बेहद जरूरी है.
(२) आन्दोलनों में कुछ योगदान देने के लिए अचानक सब छोड़ कर निकलने से पहले पत्र-व्यवहार व स्थानीय स्तर पर कुछ योगदान देना बहुत कामगार साबित होता है.
(c) अच्छे नेताओं को शांत, संयमित होना चाहिए और बडबोलेपन से बचना चाहिए.

19.4.11

झंझावत

दिमाग में काफी कुछ चल रहा है. जीवन को उपयोगी कैसे बनाया जाए? समय समय पर जीवन को दिशा देने की कोशिश की है - एक राह पकड़ कर चलने की, लेकिन हर बार कमजोर साबित हुआ हूँ. एक बार मन में आया भी कि शायद मैं कमजोर ही हूँ, और जीवन का सबसे अच्छा उपयोग यही है कि ईमानदारी से गृहस्थ पालन करता चलूँ. लेकिन उस से मन को थोड़े समय के लिए ही तसल्ली मिलती है.

इस जीवन में मेरी सबसे बड़ी पूँजी यही है कि मैं ईमानदारी से अपना समय बिता रहा हूँ. मैंने सब उतार चढाव में सत्य बोलना, और रिश्वत के बिना अपने काम ठीक तरीके से करना जारी रखा है. ट्रेन में TTE को और BSNL के लाइन मैन को पैसे नहीं देना, VIP कोटा से अपनी ट्रेन टिकेट को confirm नहीं करवाना - ऐसे कुछ काम तो अब आदत बन गए हैं.
फिर भी कुछ बातें उद्वेलित करती रहती हैं, जिन के लिए न तो कुछ करता हूँ और न ही करने की ख्वाहिश छोड़ पता हूँ:

1. बाबुओं और नेताओं द्वारा भ्रष्ट आचरण
2. अंग्रेजी को अन्य भाषाओं की तुलना में वरीयता
3. विनम्रता और निष्काम कर्म की कमी

जब से अनुपम जी ISKCON में व्यस्त हुए हैं, मेरे भीतर की भक्ति और समर्पण के भाव जाग रहे हैं. भक्तों का संग अच्छा लगता है और उनकी विनम्रता और प्रेम मुझे प्रेरणा दे रहा है. इसी प्रेरणा का परिणाम ये झंझावत है, जो मेरे दिल और दिमाग में चल रहा है.

उम्मीद करता हूँ की भक्तों का साथ मुझे दिशा भी दिखाएगा और एक राह पकड़ कर चलने का साहस भी देगा.

19.9.09

एक अभिव्यक्ति

[राजीव जी अग्रवाल हमारे करीबी दोस्त तब बने जब हम इपस्विच में एक हिंदू मन्दिर की आवश्यकता के बारे में बात करते थे। फ़िर वो भारत चले गए और काफ़ी समय तक हमारी बात नहीं हुई। कल ही उन्होंने जब ये कविता भेजी तो सुखद आश्चर्य हुआ कि उनके भीतर एक कवि भी विराजमान है। ये कविता उन्होंने हमारी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस में एक कविता लेखन प्रतियोगिता के लिए लिखी थी। और अगर कविता इतनी बढ़िया लिखी होगी तो प्रथम पुरस्कार तो मिलना ही था। आप भी आनंद लीजिये।]

आज की स्थिति बहुत ही गंभीर और व्यापक है
कैसे करूं क्या करूं सोचता अध्यापक है

एक तरफ़ तो शिक्षा का विस्तार हो
पर दूसरी तरफ़ न इसका व्यापार हो
पर क्यों केवल इसका जिम्मा शिक्षक का हो
विद्यार्थी का भी तो व्यवहार भिक्षक का हो

ईश्वर से है बस यही कामना,
मन में हो बस यही भावना
शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थी हो
शिक्षक के रूप में कृष्ण जैसा सारथी हो

शिक्षक का सम्मान हो
शिक्षा पर अभिमान हो
शिक्षा और शिक्षक का नाता शरीर और आत्मा जैसा हो
और शिष्य की नजर में गुरु का स्थान परमात्मा जैसा हो

21.9.08

दो राष्ट्र का सिद्धांत

चालीस के दशक की परिस्थितियाँ पुनः बन रही हैं। उस समय जिन्ना था, अब गिलानी वही बातें कर रहा है। हिंदू और मुसलमान दो विभिन्न राष्ट्र हैं और वो एक साथ मिल कर नहीं रह सकते - यही दो राष्ट्र का सिद्धांत है, जिस के आधार पर पाकिस्तान बना, लेकिन भारत ने इस सिद्धांत को कभी स्वीकार नहीं किया।

चालीस के दशक में सांप्रदायिक ताकतें अपने चरम पर थी। एक ओर मुस्लिम लीग भारत की अखंडता को तोड़ने के लिए हिंदू व मुस्लिम समुदायों का ध्रुवीकरण करने में लगी थी, वहीं हिंदूवादी संगठन देश की अखंडता बचाने के लिए मुस्लिम लीग की हिंसा में भागीदारी कर रहे थे। दोनों समुदाय धीरे-धीरे एक दूसरे का विश्वास खोते गए और अंततः पाकिस्तान बन ही गया। आज भी पाकिस्तान यह बात मानता है की हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते, जबकि भारत इसके उलट "हिंदू मुस्लिम सिख इसाई, आपस में सब भाई-भाई" का नारा बुलंद करता रहा है।

१९४७ के बाद भारत में हिंदू-मुस्लिम सौहार्द फ़िर से स्थापित हुआ। शिक्षा पाठ्यक्रम, राजनैतिक नेता, धर्मगुरु और सामान्य जन - सभी स्तरों पर पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत को बल मिला। कुछ साम्प्रदायिक दंगों की बात छोड़ दें तो अधिकाँश समय शांतिपूर्वक ही बीता।

लेकिन १९८० के दशक में जम्मू कश्मीर के चुनावों में कथित धांधली के बाद कश्मीर में अलगाववाद का दौर शुरू हो गया। जम्मू कश्मीर में धारा ३७० के कारण ऑटोनोमी शुरू से रही है। वहाँ मुख्यमंत्री सदा मुसलमान रहे हैं, कश्मीरी लोग भारत में प्रधान मंत्री, गृह मंत्री व सेना प्रमुख भी रहे हैं - लेकिन फ़िर भी अलगाववाद यह बोल कर शुरू हुआ की भारत ने कश्मीरियों के साथ भेद-भाव किया है। झूठ के पाँव नहीं होते, लेकिन एक झूठ बार-बार बोला गया तो लोगों ने उसे ही सच मानना शुरू कर दिया। अस्सी के दशक का अलगाव नब्बे के दशक में कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीर से निकालने में कामयाब हो गया। "दो राष्ट्र के सिद्धांत" को पाकिस्तान की शह पर फ़िर से बल मिल रहा था। लेकिन भारत ने हार नहीं मानी थी।

भारत ने अलगाववादियों की बन्दूक का सामना करने के लिए सेना भेजने का फ़ैसला किया। भारतीय सेना ने आम कश्मीरियों के जान माल की रक्षा करने के लिए अलगाववादियों को खदेड़ना शुरू किया। लेकिन इस्लाम के नाम पर इसका विरोध किया गया और इल्जाम लगाया गया की भारतीय सेना कश्मीरियों पर जुल्म कर रही है। अब तर्क १८० डिग्री घूम कर कुतर्क बन गया और यह कहा जाने लगा कि क्योंकि भारतीय सेना कश्मीर में है, इसीलिए कश्मीरी आतंकवादी बन रहे हैं। आज तो चालीस के दशक की ही तरह भारत में फ़िर से एक वर्ग ऐसा बन गया है, जो कश्मीरी अलगाववादियों के भारत से अलग होने के अधिकार को मान्यता दे रहा है।

"दो राष्ट्र का सिद्धांत" हमने न कभी स्वीकार किया है, न कभी करेंगे। बराबर के अधिकार और बराबर की आजादी के साथ सब मतों के लोग भारत में सदियों से मिलजुल कर रहते हैं। ये कश्मीरी अलगाववादी भी चाहें तो मिल कर रह सकते हैं, लेकिन इस्लाम का वास्ता देकर किसी प्रकार उनके दिमाग में बैठ गया है की हिंदू जनों के साथ वो नहीं रह सकते। जो लोग ये नहीं मानना नहीं चाहते की कश्मीर की लड़ाई इस्लाम को लेकर है तो वो कृपया गिलानी का भाषण सुन लें। गिलानी ने यह भाषण श्रीनगर में हजारों लोगों के सामने दिया था; मीरवायज उमर फारूक और यासीन मलिक भी वहीं थे, पर किसी ने प्रतिवाद नहीं किया! उस भाषण के बाद भी यदि किसी को संदेह बचे तो उसकी बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है।

इस लेख के माध्यम से एक ही बात कहना चाहता हूँ की मर जाएंगे, मिट जाएंगे, पर इस बार देश का विभाजन नहीं होने देंगे। जो मिल जुल कर नहीं रह सकता, वो देश छोड़ कर जाने के लिए स्वतंत्र है। कश्मीर का सवाल सिर्फ़ जम्मू और कश्मीर राज्य या भारत-पाकिस्तान का सवाल नहीं है, बल्कि मानवीय मूल्यों का सवाल है। इस बार हम हारे तो बेहतर होगा की भारत के इतने टुकड़े हो जाएँ जितने भारत में पंथ हैं। कम से कम १०-१२ टुकड़े होने चाहियें, लेकिन वो दिन देखने से पहले मैं अपना बलिदान दे दूँगा।

12.8.08

शेख अजीज की मृत्यु के जिम्मेदार

आज से पहले मैंने शेख अजीज का नाम भी नहीं सुना था। कश्मीर के बड़े अलगाववादी नेताओं का जिक्र आता है तो यासीन मालिक, गिलानी और मीरवायज आदि का ही नाम सामने आता है। शेख अजीज के बारे में कश्मीर के बाहर के लोग कम ही जानते हैं। वो हुर्रियत के एक वरिष्ठ नेता थे और हुर्रियत Executive Council में शामिल थे। आज पुलिस की गोली से वो घायल हो गए और श्रीनगर के एक हस्पताल में उनका निधन हो गया।

शेख अजीज भारत माता के सपूत शायद न कहे जा सकते हों। वो मुख्यधारा से अलग एक राजनैतिक दल में थे और कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग स्वीकार नहीं करते थे। अमरनाथ यात्रियों के लिए बेहतर इंतजाम करने के लिए जमीन देने से उनके अभिमान को ठेस लगी थी और उन्होंने इसका विरोध किया था। उनका तर्क था कि अमरनाथ यात्रियों को पहले से ही कश्मीरियों का सहयोग मिलता रहा है और भविष्य में भी यात्रियों को इस सहयोग के अतिरिक्त कुछ देने की आवश्यकता नहीं है। अभी कुछ साल पहले ही बर्फ के तूफ़ान से सैकडों यात्री हताहत हुए थे, उसकी याद हम भारतीयों को ही नहीं है तो इन अलगाववादी नेताओं से क्या उम्मीद करें? शेख अजीज ने कभी अमरनाथ यात्रा तो की नहीं, इसलिए उनको यात्रियों के कष्ट का अंदाजा नहीं लग पाया और बेहतर सुविधाओं का विरोध कर बैठे।

खैर, शेख अजीज आज नहीं रहे। उनको पुलिस की गोली तब लगी जब वो अपने समर्थकों के साथ मुजफ्फराबाद जा रहे थे। ये वही मुजफ्फराबाद है, जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की राजधानी है। मुझे लगता है कि मुजफ्फराबाद को भारत अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है, इसलिए शेख अजीज को भारत के ही किसी दूसरे हिस्से में जाने पर पुलिस को गोली चलाने की जरूरत नहीं थी। पर क्योंकि पाकिस्तान ने पिछले छ: दशक से मुजफ्फराबाद समेत हजारों वर्गमील जमीन पर कब्जा जमाया हुआ है, इसलिए शायद भारत सरकार को ऐसा लगा कि शेख अजीज वस्तुत: पाकिस्तान ही जा रहे हैं। ये भी हो सकता है की शेख अजीज कश्मीर के तथाकथित "आर्थिक बहिष्कार" के विरोध में मुजफ्फराबाद जा रहे थे, इसलिए सरकार उसे रोकना चाह रही हो। दो भाइयों के बीच मनमुटाव हो और एक भाई यदि दुश्मन के घर जाने लगेगा तो उसे कोई समझदार आदमी रोकेगा ही। भारत सरकार ने उन्हें समझाया, अपीलें की, यकीन दिलाया कि कोई "आर्थिक बहिष्कार" नहीं है, पर अपने मद में चूर हुर्रियत के नेताओं को लगा कि कश्मीरियों की भावनाओं को भड़काने और इसका राजनैतिक लाभ उठाने का इस से अच्छा मौका नहीं मिलेगा। वो मुजफ्फराबाद जाने की जिद में आगे बढे, पुलिस ने रोका पर जब हिंसा शुरू हो गयी तो पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। शेख अजीज की दुखद मृत्यु इसी का परिणाम है।

मुझे मालूम है कि कश्मीर में जनता को तस्वीर का एक ही पहलू दिखाया जाएगा - "भारत की सेना और पुलिस की बर्बरता का एक और नमूना"। शेख अजीज अपने और हुर्रियत के दुराग्रह का शिकार हुए, ये सच बोलने की हिम्मत कश्मीर में किसी को नहीं है। एक जिम्मेदार और सत्यनिष्ठ व्यक्ति न तो अमरनाथ यात्रियों को अतिरिक्त सुविधाओं का विरोध करेगा और न ही घरेलू झगडों को लेकर दुश्मन से हाथ मिलाएगा, लेकिन हुर्रियत में न तो कोई जिम्मेदार नेता है और न ही सत्यनिष्ठ।

सच यही है कि अमरनाथ और आर्थिक बहिष्कार को लेकर किए गए इस झूठे प्रचार की जिम्मेदार बन्दूक संस्कृति है जिस वजह से घाटी में सच बोलने की हिम्मत कोई नहीं करता। शेख अजीज की मृत्यु का जिम्मेदार हुर्रियत का झूठा प्रचार और उनका दुराग्रह ही है।

3.4.08

हिन्दी में MBA, यानी बेहतर concepts?

भाई, आम तौर पर तो यही माना जाता है कि हिन्दी में MBA पढोगे तो देश विदेश में छपने वाले ज्ञान से वंचित भी रह जाओगे और नौकरी भी नहीं मिलेगी। लेकिन व्यवसायिक जगत शायद ऐसा नहीं मानता।

वर्धा के प्रसिद्ध विश्व विद्यालय ने जब हिन्दी भाषा में MBA शुरू की, तो पेंतालून के Managing Director किशोर बियानी जी ने कहा, "अपनी भाषा में शिक्षा पाना सदा ही अच्छा होता है। Concepts की समझ भी बेहतर बनती है। यदि पाठ्यक्रम अंग्रेजी में होने वाली MBA के बराबर का होगा तो ऐसे प्रत्याशियों के चयन में कोई समस्या नहीं आएगी"।

सामान्य जनों के लिए ये अनोखी बात हो सकती है। कुछ लोग इसे ऐसे लोगों की मूर्खता समझेंगे जो अपनी भाषा को आज भी पकड़ कर बैठे हैं और दुनिया की धारा से उलट चलने में अपनी ऊर्जा गँवा रहे हैं। कुछ लोग इस पर गर्व भी महसूस करेंगे। कुछ लोग इस घटना को भारतीय जनों की सिर्फ़ एक दबी हुई भावना की सुखद अभिव्यक्ति मानेंगे। किसी भी दृष्टि से इसको देखें, पर एक बात से कोई इनकार नही कर सकता कि ज्ञान और भाषा दो अलग अलग बातें हैं, और आज कल की अंधी दौड़ में ज्ञान और अंग्रेजी भाषा को एक ही बात मान लिया गया है। वर्धा विश्व विद्यालय का ये साहसिक कदम समाज में फैली हुई इस अवधारणा को दूर करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि उच्च शिक्षा सिर्फ़ अंग्रेजी में ही पायी जा सकती है।

वर्धा से पहले ही हैदराबाद के एक विश्व विद्यालय ने उर्दू माध्यम में MBA दी थी और उसके १००% छात्रों को नौकरी भी मिल गयी थी। ICICI के कार्पोरेट संचार समूह के मुखिया चारुदत्त देशपांडे जी का कहना है, "वित्त उद्योग में अंग्रेजी कि अनिवार्यता का कोई पवित्र नियम नहीं है। यहाँ पर सब अंकों (गणित) का काम है। यदि concepts स्पष्ट हैं तो नौकरियों में चयन में कोई समस्या नहीं होगी। वास्तव में front office कि नौकरियों के लिए तो स्थानीय भाषा में MBA पढने वाले लाभ की स्थिति में ही रहेंगे।"

पूरा समाचार यहाँ देखिये: http://www.dnaindia.com/report.asp?newsid=1156781&pageid=2



12.2.08

इकत्तीस की हो गयी आज! जन्मदिन मुबारक!!

आभा, तुम्हे जन्मदिन की बहुत बधाइयां। आज इकत्तीस वर्ष की हो गयी हो, जिस में से आठ साल तुम ने मुझे दिए हैं।

२८ अक्तूबर, १९९९ - कल की ही बात लगती है, जब हम पहली बार मिले थे। तब से लेकर अब तक ये ख्याल अनेकों बार मेरे मन में आया है कि काश! हम पहले मिलते तो मैं तुम्हारा बचपन भी देख पाता। जवानी का बचपना तो देख लिया, बचपन का बचपना रह गया। खैर ...

हमारे मिलने के एक सप्ताह बाद ही मुझे TCS में समय से पहले पदोन्नति मिल गयी। तुम मेरे लिए भाग्यशाली साबित हुयी। फिर शादी के बाद तुम्हारे साथ देश-विदेश देखने को मिला। तुमने मुझे घर दिया, और दो बहुत ही special बच्चे विष्णु व गरिमा दिए। विष्णु की देखभाल के लिए तुमने TCS की अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूर्णकालिक गृहस्थी में ध्यान लगा लिया। समय कि आवश्यकता के अनुसार तुमने जो निर्णय लिया, उस पर मुझे तुम पर गर्व है। बच्चों के आत्मनिर्भर बनने के बाद तुम अपना कैरीअर आगे बढाओ, यह हम दोनो की ही इच्छा है।

तुम्हारी सब से खास बात जो मुझे लगती है कि तुम मेरी धर्म पत्नी हो, मात्र पत्नी नहीं। धर्म के मार्ग पर चलाने वाली, धर्म की व्याख्या करने वाली और निर्भीक व स्पष्ट राय देने वाली आभा - तुमने मुझे सदा सही राह दिखाई है। अपनी कमजोरियों के वशीभूत मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी, जिनका मुझे असीम दुःख होता है। आर्मी कैंटीन का सामान बरतना और हिन्दी माध्यम इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने कि राह में शुरूआती असफलताओं से घबरा कर पलायन - इन दोनों गलतियों से मैं दिन रात कष्ट पाता हूँ क्योंकि इन घटनाओं ने मेरे आत्म विश्वास को भीतर से खोखला कर दिया है। लेकिन तुमने दोनों बार मुझे न केवल सही राह दिखाई थी, बल्कि सही राह चुनने का दबाव भी बनाया था।

शादी के बाद मैं तुम्हें जीवन के सुब सुख देना चाहता था। मुझे याद है मैंने तुम्हे एक कार्ड दिया था, जिसमे लिखा था - "I want a life for us which will be better than all our previous lives". हमने कोशिश भी की लेकिन सच्चाई का मार्ग छोड़ते ही हमारे सुख के दिन छिन गए। भोग बढ़ गया और भजन छूट गया। आज के इस महत्त्वपूर्ण दिन मैं तुम्हे यही उपहार देना चाहता हूँ कि मैं क्रोध, आलस्य और पर-उपहास - ये तीन दुर्गुण छोड़ रहा हूँ। आशा है कि तुम्हें यह उपहार अच्छा लगेगा।

आज के दिन स्वामी विवेकानन्द की लिखी इस कविता के माध्यम से तुम्हे शुभकामनाएं देता हूँ:

The mother's heart, the hero's will,
The softest flower's sweetest feel;
The charm and force that ever sway
The altar fire's flaming play;
The strength that leads, in love obeys;
Far-reaching dreams, and patient ways,
Eternal faith in Self, in all
The sight Divine in great in small;
All these, and more than I could see
Today may "Mother" grant to thee।

25.12.07

विष्णु की पढाई

दीवाली की छुट्टियों में जब मैं डेनमार्क से भारत आया तो दिल्ली में घर के निकट कोई अच्छा हिन्दी माध्यम का विद्यालय ढूँढा। मेरे आश्चर्य एवं दुःख की सीमा न थी जब मैंने पाया कि कोई ऐसा विद्यालय है ही नहीं। नॉएडा में एक विद्यालय ऐसा मिला, पर चूँकि उनकी बस घर के पास तक नहीं आती थी इसलिए वह भी उपयुक्त नहीं जान पड़ा। वसुंधरा एन्क्लेव में ममता पब्लिक स्कूल में विष्णु का दाखिला करवाया, जो अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देता है।

ममता पब्लिक स्कूल में जल्द ही विष्णु का मन लग गया और उसने हिन्दी, अंग्रेजी वर्णमाला सीख ली। सौ तक अंग्रेजी गिनती भी सीख ली। फरवरी २००७ में जब विष्णु को स्कूल जाते हुए मात्र चार महीने हुए थे तो स्कूल के वार्षिक उत्सव में विष्णु ने सामुहिक नृत्य के कार्यक्रम में हिस्सा लिया। हम देखने गए और विष्णु का नृत्य देख कर बहुत खुश हुए। जो चीज खली वो थी बोलीवुड का बोल-बाला। छोटे छोटे बच्चे बोलीवुड के "कजरारे नैना" और "It's the time to disco" आदि पर नाच रहे थे। मेरे विचार से संस्कारित गीत एवं अन्य कार्यक्रम होने चाहियें और यह बात मैंने स्कूल की प्रधानाचार्या श्रीमती ममता वालिया के सामने रखी। प्रधानाचार्या ने मेरी बात सूनी और अपनी बेबसी कुछ इस प्रकार से दिखाई - "आज कल बच्चों को यही अच्छा लगता है, हम क्या करें।" मैं दुखी मन से घर लौटा।

अप्रैल २००७ में विष्णु का दाखिला नॉएडा के सरस्वती शिशु मंदिर में कराया। इस स्कूल की बस हमारे घर के नजदीक नहीं आती थी इसलिए सुबह ऑफिस जाने से पहले मैं विष्णु को स्कूल छोड़ने जाने लगा। दोपहर को विष्णु को लाने की जिम्मेवारी मेरी पत्नी आभा ने संभाल ली। गर्मी के दिनों में एक वर्ष की बेटी को घर पर आया के पास छोड़ कर आभा विष्णु को लेने जाती थी। इस छोटे से कष्ट के सामने बड़ी ख़ुशी हमारे सामने ये थी कि विष्णु को अच्छे संस्कार मिलने लगे। स्कूल पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का असर होने के कारण विष्णु को अनुशासन और बड़ों का सम्मान करना आदि गुण मिलने लगे। लेकिन हमें हैरानी तब हुई जब हम ने देखा की हिन्दी माध्यम विद्यालय में गणित अंग्रेजी भाषा में पढाया जाता है। अंग्रेजी गिनती और अंग्रेजी पहाडे देख कर मेरा माथा ठनक गया, पर अब कुछ कर नहीं सकता था। विष्णु सात महीने उस स्कूल में रहा और उस ने हिन्दी वाक्य पढ़ना / लिखना, अंग्रेजी के कुछ शब्द और गणित में ४ तक पहाडे सीख लिए.

फिर मैं परिवार सहित यहाँ इंग्लैंड आ गया हूँ। विष्णु यहाँ अंग्रेजी माध्यम के एक स्कूल में जा रहा है। उसकी आयु के बच्चे अभी अंग्रेजी वर्णमाला और २० तक गिनती सीख रहे हैं। विष्णु उनकी तुलना में काफी आगे है, पर अंग्रेजी बोलना उस ने अभी सीखना शुरू किया है.

16.12.07

ब्लागिंग फिर शुरु

एक साल से ज्यादा हो गया, ब्लाग पर कुछ लिखा ही नहीं। दिसम्बर २००६ में दो वर्ष डेनमार्क रहने के बाद भारत लौट गया। दिल्ली में गृहस्थी फिर से शुरु की, पु‌त्र विष्णु की पढ़ाई और अपने हिन्दी माध्यम में इन्जीनियरिंग कॉलेज शुरू करने के प्रयासों में वयस्त हो गया। जो थोड़ा समय मिलता, वह मित्रों व रिश्तेदारों से मिलने में निकल जाता। ब्लाग पर लिखना बन्द हो गया।

लगभग एक वर्ष बाद अब मैं ब्रिटिश टेलीकाम (British Telecom) के एक प्रोजेक्ट पर इपस्विच (Ipswich) इंगलैण्ड आ गया। अब जब कि मैं यहां settle हो गया हूं तो लगता है कि पुनः ब्लाग पर लिखना शुरू कर सकता हूं।

पिछले एक वर्ष में काफी कुछ घटित हुआ, जिसके बारे में लिखना चाहता हूं। विष्णु की तथाकथित हिन्दी माध्यम स्कूल में पढ़ाई, अपने इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करने के प्रयास और निराशा व निरुत्साह के दौर के बारे में शीघ्र ही लिखूंगा।

15.12.06

हाफ पैन्ट वाले कहना असभ्यता का परिचय

वर्तमान समाज में से विनम्रता का लोप इस कदर हो गया है कि वैचारिक असहमति होने मात्र से लोग गाली-गलौज पर उतर आते हैं। काफी हद तक तो इस प्रकार का असंयमित व्यवहार राजनेता ही करते हुए पाए जाते है। पर अभी हाल ही में एक अराजनैतिक सज्जन गान्धी जी को बुड्डा कहते हुए मिले। उम्र के लिहाज से व बड़े होने के नाते गान्धी जी को बुड्डा कहना असभ्यता ही कही जा सकती है। कर्मों के लिहाज से गान्धी जी बुड्डे हुए ही नहीं; वो चिर युवा थे। जीवन पर्यन्त युवकों को भी शर्मिन्दा कर जाए ऐसी कर्मठता से काम करते रहे।

खैर यह लेख लिखने का उद्देश्य सिर्फ यह याद दिलाना है कि हम वैचारिक मतभेदों को व्यक्तिगत मतभेदों का रूप देने से बचें। कहा जाता है कि जब गम्भीर चर्चाओं के दौरान आप व्यक्तिगत हमला करने लगते हो तो इसका अर्थ है कि आप चर्चा में हार चुके हो। जैसे खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचती है वैसे आप सामने वाले को नोचने लगते हो।

हाल ही में एक मित्र ने ध्यान दिलाया कि एक जिम्मेदार व्यक्ति जो राजनीति में भी सक्रिय हैं वो राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ को हाफ पैण्ट कह कर सम्बोधित करते हैं। संघ को काफी नजदीक से मैंने भी देखा है व मेरी दृष्टि में संघ के लिए बहुत आदर है। राष्ट्रभक्ति, समाज सेवा, किसी आपदा के समय पीड़ितों की सेवा, वनवासी क्षेत्रों में सेवा कार्य, हिन्दू समाज के उत्थान के लिए अहर्निश प्रयत्नशील, इत्यादि अनेक प्रकल्पों में आदरणीय कार्य करने का श्रेय इस संगठन को दिया जा सकता है। ऐसे सैकड़ों स्वयंसेवक आज भी सेवारत हैं जिन्होंने अपना परिवार छोड़कर आजीवन अविवहित रहते हुए देश सेवा करने का व्रत लिया हुआ है। जब कोई देश के राजनेताओं से त्रस्त होकर कहता है कि भारत को तो भगवान ही चला रहा है तो मेरे मन में इन्हीं सर्वत्यागी व दृढ़निश्चयी जवानों का खयाल आता है। ऐसे स्वयंसेवी लोगों को हाफ पैण्ट कह कर सम्बोधित करना अशोभनीय ही नहीं असभ्य भी है। फिर ऐसी असभ्यता प्रतिक्रियाओं को भी जन्म देती है जिससे समाज में आपसी सौहार्द घटने लगता है।

4.12.06

हमें मदद चाहिए

भाषा एवं शिक्षा के सम्बन्ध में विचार करते समय मन में अनेक प्रश्नों का जन्म हुआ। जैसे कि −

• भारत में शिक्षा के लिए मातृभाषा का माध्यम ज्यादा ठीक है या अंग्रेजी (विदेशी) भाषा का माध्यम बेहतर है?
• क्या मातृभाषा में शिक्षा पाने से गणित एवं विज्ञान विषयों को समझने में सहायता मिलती है?
• क्या अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देना अंग्रेजी भाषा पर मजबूत पकड़ की गारण्टी है?
• क्या अंग्रेजी शिक्षा को अनिवार्य बनाने से बच्चों की शिक्षा पर खराब असर पड़ सकता है?

इन प्रश्नों का समाधान करने के लिए हमें निम्नलिखित जानकारी की आवश्यकता है। यह काम अकेले हमारे बस का नहीं है, इसलिए यदि आप मदद कर सकते हैं तो कृपया सम्पर्क करें।

1) पिछले दस वर्षों के दौरान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में प्रथम 10 स्थान पाने वाले छात्रों को किस माध्यम में शिक्षा मिली थी? यदि एक से अधिक माध्यमों से शिक्षा मिली हो तो पांचवी से दसवीं कक्षा के छ: वर्षों के दौरान अधिकांश शिक्षा जिस माध्यम से मिली थी, उसी को शिक्षा का माध्यम माना जाए।

2) ऊपर लिखी जानकारी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में ही प्रथम 50 स्थान पाने वाले छात्रों के लिए भी एकत्रित करनी है।

3) ऊपर लिखी जानकारी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) या केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) मेडिकल प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले छात्रों की भी एकत्रित करनी है।

4) विज्ञान व गणित के शिक्षकों का अनुभव क्या कहता है − क्या शिक्षा के माध्यम से छात्रों की योग्यता पर असर पड़ता है?

5) यदि आप किसी ऐसे छात्र को जानते हैं जो पढ़ तो अपनी मातृभाषा में रहा है, लेकिन अंग्रेजी विषय में कमजोरी के कारण पढ़ाई से विरक्त हो रहा है, तो कृपया हमें उसका नाम व पता भेजिए।

6) ऐसे छात्रों की कमी नहीं जो अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने के बावजूद अंग्रेजी ठीक से नहीं बोल पाते। ऐसे छात्रों से बात करके उनसे पूछना है कि इस का क्या कारण है। यह कारण, छात्र का नाम, पता व कक्षा हमें भेजिए। इस जानकारी के लिए वें ही छात्र चुने जाएं जो कम से कम 5 वर्ष अंग्रेजी माध्यम में पढ़े हों।

7) यदि इस विषय पर पहले से ही कोई भारतीय अथवा विदेशी सर्वेक्षण हुआ हो कृपया उसकी जानकारी भी हमें भेजें।

इस जानकारी के एकत्रित होने पर हम इसे पुस्तक के रूप में व इन्टरनेट पर प्रकाशित करेंगे। हमारा विश्वास है कि यह जानकारी छात्रों व अभिभावकों के लिए अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होगी।

30.11.06

महापुरूषों में प्रतिस्पर्धा

शहीद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु व चन्द्रशेखर आजाद की शहादत के ७५ वर्ष पूरे होने पर नवनिर्माण के ३ विशेषांक इस वर्ष फरवरी, मार्च अप्रैल माह में निकले थे। इन विशेषांकों के लिये मैंने यह लेख लिखा था। सृजनशिल्पी जी ने "गाँधी की महानता पर उठते प्रश्न" लेख में जो प्रश्न प्रस्तुत किये हैं और स्वामी रामदेव, ओशो आदि महापुरुषों के विचार लिखे हैं, उस परिपेक्ष्य में यह लेख असामयिक नहीं होगा।
मेरा मानना है कि गान्धीवाद के नाम से किसी वाद को रचने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि गान्धी जी ने कोई नई बात नहीं बताई थी। सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, पंचायती राज व्यवस्था आदि बातें भारतीय संस्कृति में सदा से रही हैं। गांधी जी ने सिर्फ उन को अपने तरीके से पुनः स्थापित करने का प्रयास किया था। उस विषय पर फिर कभी लिखूंगा।

महापुरूषों व आम इन्सानो में एक अन्तर यह होता है कि महापुरूष निन्दा व ईर्ष्या के भाव नहीं रखते, जबकि एक सामान्य व्यक्ति इन दुगुर्णों से ग्रस्त रहता है। आज कल गान्धी जी व भगत सिंह जैसे महापुरूषों की तुलना करना व दोनों में से किसी एक को श्रेष्ठ बताने का रिवाज सा चल पड़ा है। परन्तु इतिहास के पन्ने पलटने पर हम पाते हैं कि इन महापुरूषों में मतभेद तो अनेक थे, मगर किसी ने भी दूसरे व्यक्ति की न तो निन्दा की और न ही किसी प्रकार की स्पर्धा व ईर्ष्या को मन में स्थान दिया।

शहीद सुखदेव ने अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले ही गान्धी जी को एक खुला पत्र लिखा था। इस पत्र में गान्धी जी के विचारों व कार्यप्रणाली से मतभिन्नता ही भरी हुई थी, परन्तु सुखदेव जी पत्र का आरंभ “परम कृपालु महात्मा जी” के सम्बोधन से प्रारम्भ करते हैं। पत्र में सुखदेव जी ने गान्धी−इर्विन समझौते के बाद गान्धी जी की उन प्रार्थनाओं के औचित्य पर सवाल उठाए जिनमें गान्धी जी ने क्रान्तिकारी आन्दोलन को बन्द करने का आग्रह किया था। अत्यन्त शालीन भाषा में लिखे इस पत्र का अन्त सुखदेव जी “आपका, अनेकों में से एक” लिख कर करते हैं।

ठीक इसी प्रकार गान्धी जी जब इन शहीदों के बारे में बोलते हैं तो उनकी बातों से इन वीरों के प्रति आदर ही झलकता है, और विरोध करते हैं तो मात्र ‘हिंसा’ की मानसिकता का। 29 मार्च 1931 को ‘भगत सिंह’ शीर्षक से नवजीवन में प्रकाशित एक लेख में गान्धी जी जहां एक ओर गान्धी जी भगत सिंह से मतभेद प्रगट करते हैं,वहीं दूसरी ओर लिखते हैं कि “इन वीरों ने मौत के भय को जीता था। इनकी वीरता के लिए इन्हें हजारों नमन हों।” इसी लेख में गान्धी जी लिखते हैं कि भगत सिंह हिंसा को अपना धर्म नहीं मानता था; वह अन्य कोई उपाय न देख कर ही खून करने को तैयार हुआ था।

हम पाते हैं कि महापुरूष मतभेद तो प्रकट करते हैं, परन्तु व्यक्तिगत विरोधों का उनकी दृष्टि में कोई स्थान नहीं होता। ऐसे ही गुण उन्हें जनसाधारण की दृष्टि में महापुरूष बनाते हैं।

भारतीय संस्कार भी हमें यह सिखाते हैं कि “पापी से भी घृणा न करो”। फिर यह कैसे हो गया कि हम लोग जिस व्यक्ति के विचारों व कृत्यों से सहमत नहीं होते, उससे विद्वेष पाल लेते हैं। भगत सिंह की अतिशय देशभक्ति व 23 वर्ष की अल्पायु में अपना सर्वस्व देश पर न्यौछावर कर देना ही उनके प्रति श्रद्धाभाव उत्पन्न करने के लिये काफी है − चाहे हम भगत सिंह की कार्य प्रणाली से सहमत न हों। उसी प्रकार गान्धी जी द्वारापैदा की गई जनचेतना, हर प्रकार के भौतिक सुखों का त्याग तथा अतिशय भारत−प्रेम भी उन्हें श्रद्धेय ही बनाते हैं − चाहे हम उनकी कार्य प्रणाली से सहमत न हों।

आइये, हम प्रण करें कि कभी दो व्यक्तियों की तुलना नहीं करेंगे। कभी किसी व्यक्ति की निन्दा भी नहीं करेंगे। महापुरूषों के गुण उन्हें सदैव आदरणीय बनाते हैं, चाहे उनकी कार्य प्रणाली से हम सहमत न हो पाएं। इसलिए हर मतभेद के बावजूद उनके गुणों का आदर हम करते रहेंगे।

27.11.06

देश विदेश का साहित्य हिन्दी में

अनुनाद भाई ने एक बहुत शुभ समाचार चिठ्ठाकार समूह पर भेजा। इसे पढ़ कर दिल प्रसन्न हो गया। सोचा कि इस लिंक को सहेज लूं, बाद में काम आएगा।

समाचार दुर्भाग्य से अंग्रेजी में ही मिला, हिन्दी में नहीं मिल पाया। इसलिये जो पाठक अंग्रेजी नहीं पढ़ सकते, उनको बता दूं कि अब देश विदेश का साहित्य हिन्दी में पहले की अपेक्षा अधिक मिलेगा क्योंकि अनुवादक लोग बढ़ रहे हैं। एक और अच्छी बात ये है कि ये अनुवाद मूल भाषा से हिन्दी में सीधे हो रहे हैं, अंग्रेजी के रास्ते नहीं - इससे अनुवाद की गुणवत्ता श्रेष्ठतर ही होगी।

पूरा समाचार यहां पढ़ें।

24.11.06

यही लैंग्वेज है नए भारत की

बाल मुकुन्द जी का लिखा यह लेख 13 नवम्बर 2006 के नवभारत टाइम्स में छपा था। मूल लेख यहां देखें।

हमारे सामने राजधानी से प्रकाशित होने वाले हिंदी के सभी प्रमुख अखबार रखे हैं। दैनिक हिंदुस्तान के पहले पन्ने पर एक शीर्षक है 'वीवीआईपी नातियों की सुरक्षा कड़ी।' दूसरा शीर्षक है 'पीएम सुरक्षा में गड़बड़ी पर दो की छुट्टी।' भीतर के पन्ने पर एक शीर्षक है 'थीम वेडिंग के बढ़ते चलन से एंटरटेनमेंट कंपनियों की चांदी।' वीवीआईपी के बदले अति महत्वपूर्ण, पीएम की जगह प्रमं, वेडिंग की जगह शादी और एंटरटेनमेंट की जगह मनोरंजन लिखा जा सकता था, लेकिन नहीं लिखा गया, क्योंकि ये सभी विकल्प आसान हैं, प्रचलित हैं और शीर्षक में पॉइंट वगैरह के हिसाब से फिट बैठते हैं।

अंग्रेजी शब्दों या एब्रिविएशन का यह इस्तेमाल सिर्फ इसी अखबार में नहीं हुआ है। जागरण ने लिखा है 'सीरियल किलर्स से गांव ने नाता तोड़ा' और 'आतंकी हमले की आशंका से हाई अलर्ट।' जनसत्ता का शीर्षक है 'छुट्टी के कारण सीलिंग नहीं हुई।' अखबार अब डब्ल्यूटीओ, एसईजेड, थर्ड राउंड, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और केमिकल मार्केट जैसे जुमलों का हिंदी अनुवाद करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।

आज से पांच साल पहले नवभारत टाइम्स ने जब अपने शीर्षकों और खबरों में अंग्रेजी शब्दों और एब्रिविएशन को ज्यों का त्यों रख देने का प्रयोग शुरू किया था, तब इस पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि हम हिंदी का सत्यानाश कर रहे हैं। कुछ ने कहा कि जिन शब्दों के लिए हिंदी में विकल्प हैं या बनाए जा सकते हैं, उन्हें जबरन ठूंसने की कोशिश गलत है। स्टेशन और रेल जैसे जो शब्द हिंदी में रच-बस चुके हैं, उन्हीं के प्रयोग तक सीमित रहना चाहिए। पांच दशक पहले डॉ. रघुवंश जैसे विद्वान 'रेल' और 'स्टेशन' जैसे शब्दों के लिए भी तैयार नहीं थे। कुछ लोगों ने 'लौह पथगामिनी' और 'धूम्र शकट विरामालय' जैसे विकल्प भी बनाए थे। खैर, वे चले नहीं। विद्वान लोग अभी हिंदी में रेल और स्टेशन को पचा हुआ घोषित करना ही चाहते थे कि लोकल, ब्लू लाइन और मेट्रो जैसी चीजें धड़धड़ाती हुई घुस गईं।

बहरहाल हमने उन आलोचनाओं का कोई जवाब नहीं दिया और न ही अपनी राह बदली। खबरों को अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए जैसी भाषा हमें कारगर लगी, हम उसका प्रयोग करते रहे। इस पांच साल के दौरान ज्यादातर अखबार उसी तरह की भाषा का इस्तेमाल करने लगे हैं। अब अंग्रेजी शब्दों और एब्रिविएशन का वैसा विरोध नहीं हो रहा है, जैसा उस समय हो रहा था। सीपीआई और सीपीएम को भाकपा और माकपा या हाई कोर्ट को उच्च न्यायालय लिखने जैसा आग्रह अब कोई नहीं करता।

नवभारत टाइम्स की तर्ज पर राजधानी के दूसरे हिंदी अखबारों में जो बदलाव आया है उसके लिए यह सोचना शेखचिल्लीपना होगा कि हमारा अखबार इतना ताकतवर और प्रभावशाली है कि इसने इन पांच वर्षों में हिंदी भाषा की पूरी तस्वीर बदल दी और इसी वजह से दूसरे अखबारों को नवभारत टाइम्स का अनुगामी बनना पड़ा। हमें ऐसा कोई भ्रम नहीं है। किसी भाषा को बनाने-संवारने का काम पूरा समाज करता है और उसकी शक्ल बदलने में कई-कई पीढि़यां लग जाती हैं। लेकिन इस बात का श्रेय नवभारत टाइम्स को जरूर मिलना चाहिए कि उसने उस बदलाव को सबसे पहले देखा और पहचाना, जो पाठकों की दुनिया में आ रहा है। दूसरे अखबारों को उस बदलाव के दबाव की वजह से नवभारत टाइम्स के रास्ते पर चलना पड़ा, यह उनके लिए चॉइस की बात नहीं थी।

अंग्रेजी आज की जरूरत है। यही वह खिड़की या दरवाजा है, जिसके द्वारा हम बाहर की दुनिया देख सकते हैं या बाहर की रोशनी भीतर ला सकते हैं। संभव है कि किसी ऊंची डिग्री के बावजूद आज नौकरी नहीं मिले, लेकिन सिर्फ अंग्रेजी की बदौलत नौकरी मिल सकती है। कारण जो भी हों, अंग्रेजी पूरी दुनिया के लिए एक तरह से लिंक लैंग्वेज का काम कर रही है। हमें और हमारे बच्चों को इसकी पढ़ाई करनी ही होगी- चाहे इसे फिजिक्स, केमिस्ट्री की तरह पढ़ें या हिंदी-उर्दू-संस्कृत की तरह।

आज का परिदृश्य देखें। देश में बेरोजगारी ९.२ प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। लेकिन इसी के साथ यह भी सच है कि प्रफेशनल लोगों की बेहद कमी है। हमारे पास पर्याप्त डॉक्टर, इंजीनियर और आईटी प्रफेशनल नहीं हैं। अमेरिका प्रति वर्ष दस लाख की आबादी पर लगभग साढ़े सात सौ आईटी प्रफेशनल तैयार करता है और चीन पांच सौ, लेकिन भारत सिर्फ दो सौ। क्या बिना अंग्रेजी के यह पढ़ाई की जा सकती है? भविष्य में अंग्रेजी के बिना साहित्य सृजन, पठन-पाठन, खेती-किसानी और मजदूरी हो सकेगी, लेकिन इन क्षेत्रों में प्रतिष्ठा नहीं होगी। इनमें रोजगार की तेज वृद्धि की उम्मीद भी नहीं दिखती। जिन क्षेत्रों में नौकरी, धन और प्रतिष्ठा होगी वे एविएशन, बैंकिंग, इन्फ्रास्ट्रक्चर, आईटी, फार्मा और रिटेलिंग जैसे क्षेत्र होंगे, जहां अंग्रेजी की जरूरत होगी। विदेश जाने और देश में भी ऊंची पढ़ाई के लिए अंग्रेजी की ही जरूरत होगी। इसलिए यदि अपने युवाओं को ग्लोबल बनाना है, तो बेहतर है हम उन्हें शुरू से ही अंग्रेजी पढ़ाएं।

आज जब हमारा देश दुनिया के सबसे जवान देशों में से एक है, यहां जवान लोगों के लिए रोजगार नहीं है। इस देश की तीन चौथाई आबादी की उम्र ४० साल से कम है। लेकिन जनगणना रिपोर्ट यह भी बताती है कि १९९१ में यहां १३.८ करोड़ बेरोजगार थे, जो २००१ तक आते-आते ४४.५ करोड़ हो गए। आज देश में बेरोजगारी की दर १०.१ प्रतिशत है, लेकिन ग्रैजुएट बेरोजगारी की दर १७.२ प्रतिशत है। यहां ४० प्रतिशत ग्रैजुएट और ३२ प्रतिशत टेक्निकल ग्रैजुएट बेकार बैठे हैं। इन बेरोजगार ग्रैजुएट्स के जो सहपाठी आज नौकरियों में बैठे हैं, उसका एक बड़ा कारण अंग्रेजी ही है।

दिक्कत यह है कि अंग्रेजी का जिक्र आते ही हम दोहरे मानदंड का शिकार हो जाते हैं। हर पढ़ा-लिखा हिंदुस्तानी अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में डालना चाहता है, लेकिन सामाजिक तौर पर अंग्रेजी के महत्व का विरोध करता है। बातचीत में ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी बोलता है, लेकिन हिंदी के अखबार में अंग्रेजी के शब्द देख कर नाराज हो जाता है। उसकी खुद की जिंदगी में पैंट, शर्ट, टाई, हलो, हाय शामिल हो जाए तो अच्छा है, लेकिन अखबार की भाषा नहीं बदले। घर से बाहर निकलते समय अंग्रेजी की पत्रिका कांख में दबा लेता है, लेकिन दूसरों को भाषा की सेवा करते रहने का उपदेश देता है। इस दोहरेपन से हम जितनी जल्दी मुक्त हों, उतना अच्छा होगा।

4.11.06

मेरा पीड़ादायक अनुभव

दिल्ली से डेनमार्क लौट आया हूं। अपने पुत्र विष्णु को पूर्वी दिल्ली के किसी अच्छे हिन्दी माध्यम विद्यालय में दाखिल करवाने का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाया। अपने घर के नजदीक वसुन्धरा एन्कलेव इलाके के सब विद्यालयों में घूमा, पर मुझे एक भी हिन्दी माध्यम विद्यालय नहीं मिला। सभी अंग्रेजी माध्यम में ही शिक्षा दे रहे हैं। नोएडा में प्रयास किया तो सैक्टर 12 में विद्या भारती द्वारा संचालित एक हिन्दी माध्यम विद्यालय मिला, लेकिन उसकी बस वसुन्धरा एन्कलेव में नहीं आती। मेरी पत्नी, जिसे दिल्ली में मेरी अनुपस्थिति में 2 महीने बिताने हैं, को हर रोज विष्णु को छोड़ने जाना बहुत असुविधाजनक हो जाता। इसलिए मन मार कर विष्णु को घर के नजदीक वसुन्धरा एन्कलेव में ही एक अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में दाखिला करवा दिया। विष्णु को होने वाली दिक्कतों का हमें भली भान्ति अन्दाजा है क्योंकि आज की तारीख में विष्णु को A, B, C, D के अतिरिक्त बिल्कुल अंग्रेजी नहीं आती। गिनती भी उसे हिन्दी में ही आती है। परन्तु कोई अन्य हल नहीं दिखाई दिया जिससे विष्णु की शिक्षा तुरन्त शुरू हो सके।
अपनी पीड़ा को शब्दों में कैसे बयान करूं? दिल्ली की गर्मी में बच्चों को टाई लगाकर विद्यालय जाते हुए देखना अपने आप में एक श्राप है। उस पर अंग्रेजी माध्यम से मिलने वाली अधकचरी शिक्षा किसी भी प्रकार मुझे अपने पुत्र के बारे में निश्चिन्त नहीं कर पा रही है।
विष्णु को तो अगले साल हिन्दी माध्यम के विद्यालय में ही भेजूंगा। साथ ही मैंने निश्चय किया है कि
1. ज्यादा से ज्यादा लोगों को मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने के लाभों से परिचित करवाऊंगा।
2. स्वयं एक उत्तम हिन्दी माध्यम विद्यालय की स्थापना करके एक उदाहरण प्रस्तुत करूंगा।

14.9.06

पूर्वी दिल्ली में हिन्दी माध्यम विद्यालय

आगामी अक्तूबर में मैं 3 सप्ताह के लिए भारत आ रहा हूं। इस यात्रा का एक मुख्य उद्देश्य है अपने पौने चार साल के बेटे विष्णु को किसी अच्छे हिन्दी माध्यम के विद्यालय में दाखिला दिलवाना। मेरी इच्छा यह है कि वो छ: महीने यानि अक्तूबर व मार्च के बीच में नर्सरी की पढ़ाई पूरी कर ले ताकि उसका एक वर्ष खराब न हो।

इस के लिए मुझे पूर्वी दिल्ली में एक अच्छे हिन्दी माध्यम विद्यालय की खोज है। अपने दिल्ली के रिश्तेदारों व मित्रों से कुछ खास जानकारी नहीं मिल पा रही है। आप में से किसी मित्र को इस बारे में कुछ जानकारी हो तो कृपया बताएं। मैं यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हो पा रहा हूं कि अब हिन्दी माध्यम में पढ़ाई करवाने के लिए मुझे अपने बेटे को दिल्ली के किसी दूसरे कोने में भेजना पड़ेगा।

क्या आप मदद कर सकते हैं?

संरक्षकता (ट्रस्टीशिप) का सिद्धान्त

आजादी के 60 वर्ष पूरे होते−होते देश में भुखमरी के दर्शन होने लगे हैं। अनेक सर्वेक्षण किए गए हैं और लगभग सभी इसी बात की ओर इंगित करते हैं कि भारत में आजादी के बाद व विशेष तौर पर उदारीकरण के बाद अमीरों व गरीबों के बीच खाई बढ़ी है। करोड़पतियों की संख्या बढ़ी है तो दूसरी ओर भुखमरी व गरीबी जनित आत्महत्याएं भी बढ़ी हैं। इन समस्याओं को लेकर जहां राजनेता वोटों की राजनीति में लगे हैं, तो दूसरी ओर नक्सलवाद सिर उठा रहा है। पड़ौसी देश नेपाल में तो माओवाद के नाम पर एक बड़ी शक्ति का उदय होता भी दिखाई दे रहा है।

भूख एवं गरीबी के कारण किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं को टी•वी• पर हमारे कृषि मन्त्री चाहे सामान्य घटना बता दें, परन्तु वास्तविकता यह है कि शस्य श्यामला हमारी भारत माता में अपनी सन्तानों का पालन करने का सामर्थ्य आज भी बरकरार है। समस्या इतनी ही है कि भारत माता हमें जो कुछ भी देती है, उसे कुछ प्रभावी लोग हड़प लेते हैं और गरीब लोगों को कुछ नहीं मिल पाता।

आम तौर पर कठिन दिखने वाली समस्याओं का हल बहुत आसान होता है। इस समस्या का हल भी कुछ विशेष कठिन नहीं है। जिस किसी को भी विरासत में या उद्योग −व्यवसाय द्वारा प्रचुर सम्पत्ति मिल जाए, वह उस सम्पत्ति में से अपने गुजारे भर का लेकर शेष पर राष्ट्र का हक समझे। ऐसा करने से जहां व्यक्ति गैर−जरूरी लालच से अपनी रक्षा कर सकेगा, वहीं समाज में सम्पन्नता व भाईचारा बढ़ेगा। नक्सलवाद जैसे प्रतिक्रियावादी आन्दोलनों की आवश्यकता नहीं रह जाएगी एवं सब लोग सामूहिक विकास कर सकेंगे। ‘त्यागपूर्वक भोग भोगना’ ही संरक्षता का सिद्धान्त है।

ईशावास्योपनिषद में भी गाया गया है :
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्यस्विद् धनम्।।
अथार्त् इस जगत में सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है, इसलिए त्यागपूर्वक इसे भोगते रहो। धन आदि भोग्य पदार्थ किसी के भी नहीं हैं।

आजकल तो हर एक व्यक्ति पड़ौसी की चिन्ता किए बिना अपने लिए ही जीता है। सर्वकल्याणकारी नवीन जीवन पद्धति का विकास करना हो तो उसका सबसे निश्चित मार्ग संरक्षता का सिद्धान्त ही है। साम्यवाद अथवा नक्सलवाद द्वारा पोषित ऐसी जड़ समानता को भारतीय चित्त स्वीकार नहीं कर सकता जिसमें कोई अपनी योग्यताओं का पूरा उपयोग ही न कर सके। भारत में तो हर एक को करोड़ों रूपए कमाने की स्वतन्त्रता होनी ही चाहिए, लेकिन इस सारे धन का उद्देश्य सर्व कल्याण में समर्पित कर देने का ही होना चाहिए।

अब प्रश्न यह है कि इस तरह के सच्चे संरक्षक (ट्रस्टी) कितने हो सकते हैं। बहुतेरे लोग इस सिद्धान्त को अव्यावहारिक मान लेते हैं। वें देख नहीं पाते कि आज भी ऐसे उदाहरणों से हमारा समाज भरा पड़ा है जो सच्चे अर्थों में ट्रस्टीशिप के सिद्धान्त का पालन कर रहे हैं। दूसरी बात यह भी कि अगर सिद्धान्त ठीक हो तो हमें यह देखने की बजाय कि इसका पालन कितने लोग कर रहे हैं, हमें यह देखना चाहिए कि किस प्रकार इस सिद्धान्त को हम अपने जीवन में अपना सकते हैं। संख्या बल से ही हम किसी सिद्धान्त के सही या गलत होने का निर्णय नहीं कर सकते।

लोग स्वेच्छा से संरक्षक बनें तो यह बहुत अच्छा होगा। अगर वो न बनें तो मेरा खयाल है कि उन्हें संरक्षक बनने के लिए प्रेरित करना चाहिए या फिर अहिंसक तरीकों द्वारा धनियों को या तो उनकी सम्पत्ति से वंचित करना चाहिए।

14.8.06

राष्ट्रपति जी द्वारा सात सूत्रीय शपथ

60वें स्वाधीनता दिवस के उपलक्ष्य में हमारे राष्ट्रपति जी ने युवाओं को सात सूत्रीय शपथ लेने का आह्वान किया है। ये शपथ है :

मैंने तो यह शपथ ले ली है। सब युवाओं से अनुरोध है कि दृढ़तापूर्वक यह शपथ लेकर राष्ट्र एवं जगत को खुशहाल बनाने की ओर अग्रसर हों।

राष्ट्रपति जी से विनम्र अनुरोध है कि वो देश के नेताओं को भी यह शपथ लेने को प्रेरित करें। कितना अच्छा हो कि आफिस आफ प्रोफिट बिल और सूचना के अधिकार वाले बिल जैसी हठधर्मिता छोड़ कर राष्ट्र निर्माण का काम करें। दोनों बिल चौथी एवं पांचवीं शपथ का उल्लंघन प्रतीत होते हैं।

11.8.06

परिचय − गुरूकुल कांगड़ी (भाग 2)

(भाग 1 में हमने गुरूकुल कांगड़ी की स्थापना व दैनिक चर्या के विषय में पढ़ा था। अब हम गुरूकुल के शैक्षणिक स्तर के बारे में पढ़ेंगे। बीसवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में ही एक अमरीकी यात्री श्री मीरोन फिल्पस ने गुरूकुल कांगड़ी के बारे में भारतीय समाचार पत्र पायनियर में कुछ पत्र लिखे थे। प्रस्तुत लेख उन्हीं पत्रों में उपलब्ध तथ्यों पर आधारित है।)

गुरूकुल में नैतिक व धार्मिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता था। गुरूकुल ने इसके लिए विशेष पुस्तकें भी तैयार करवाई थी एवं कुलपति स्वामी श्रद्धानन्द स्वयं इन विषयों पर छात्रों से वार्ता करते थे। छात्रों को पवित्र संस्कृत ग्रन्थो का पठन करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। छात्रों की पाठ्य सामग्री व दैनिक चर्या के आधार पर कहा जा सकता है कि गुरूकुल का वातावरण वेदों व उपनिषदों से लबालब था।

तमाम धार्मिक शिक्षा के साथ−साथ गुरूकुल का आचार्यवर्ग इस बात के लिए भी सजग था कि छात्र दुनिया में निरन्तर हो रही गतिविधियों, नवीन खोजों व उपलब्धियों से अनभिज्ञ न रहें। इसके लिए छात्रों के पाठ्यक्रम में पश्चिमी साहित्य व आधुनिक विज्ञान से सम्बन्धित पुस्तकों को न केवल स्थान दिया गया बल्कि छात्रों को गुरूकुल के पुस्तकालय के माध्यम से नवीनतम पुस्तकें व पत्रिकाएं उपलब्ध भी करवाई गईं।

फिल्पस ने गुरूकुल व अन्य संस्थाओं की दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों के बीच तुलनात्मक विश्लेषण भी किया।
  • विज्ञान - गुरूकुल के छात्र कईं वर्ष आगे हैं। भौतिकी, रसायन शास्त्र व मैकैनिक्स की अनेक गूढ़ पुस्तकों का अध्ययन गुरूकुल में होता है, अन्य संस्थानों में नहीं।
  • गणित - गुरूकुल के छात्र अन्य संस्थानों के छात्रों के समकक्ष हैं।
  • इतिहास - गुरूकुल के छात्रों ने भारतीय व ब्रिटिश इतिहास के 2000 पृष्ठ पढ़े हैं जबकि अन्य संस्थानों के छात्र 400 पृष्ठ ही पढ़ते हैं। इतिहास में यहां के छात्र अन्यत्र बी0ए0 के बराबर हैं।
  • अंग्रेजी - दसवीं में गुरूकुल के छात्र अन्य संस्थानों की दसवीं से पीछे हैं। परन्तु चौदहवीं तक पहुंचते पहुंचते वें अन्य संस्थानों की चौदहवीं के समकक्ष हो जाते हैं।
  • संस्कृत - गुरूकुल के छात्र बहुत आगे हैं। दसवीं के छात्रों की संस्कृत एम0ए0 (अंग्रेजी) के छात्रों की अंग्रेजी के बराबर की है।
  • दर्शन व तर्क शास्त्र - गुरूकुल के छात्र अन्य विद्यालयों से श्रेष्ठ हैं।

फिल्पस लिखते हैं कि गुरूकुल के छात्रों के श्रेष्ठ होने की वजहों में से एक तो शिक्षा के अनुकूल प्राकृतिक वातावरण है, दूसरे वहां के जीवन में नियमितता व अनुशासन है और तीसरे शिक्षा का माध्यम हिन्दी है जिसे भारतीय छात्र आसानी से समझकर ग्रहण कर सकते हैं। हम स्पष्ट देख सकते हैं कि गुरूकुल के संस्थापक गुरूकुल को श्रेष्ठ मार्ग पर चला पा रहे थे। यही कारण था कि महान विभूतियां जैसे महात्मा गान्धी, भूतपूर्व ब्रिटिश प्रधानमन्त्री एन्ड्रयूज, डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद व जवाहर लाल नेहरू गुरूकुल से विशेष स्नेह रखते थे और इसलिये उन्होंने गुरूकुल की यात्राएं भी की।

इसके बावजूद गुरूकुल को सरकारी मदद न मिल सकती थी। ऐसा नहीं था कि गुरूकुल को विदेशी सरकार से मदद की अपेक्षा थी पर सामान्य तर्क तो यही कहता है कि समाजोपयोगी कार्य करने वाली ऐसी संस्थाओं को मदद दी जानी चाहिए। फिल्पस के अनुसार सरकारी मदद पाने के लिए गुरूकुल को संस्कृत के स्थान पर अंग्रेजी रखनी पड़ती, जो गुरूकुल को स्वीकार नहीं था। इसके साथ−साथ गुरूकुल को अपनी स्वयं की पुस्तकों के स्थान पर सरकारी पुस्तकें पढ़ानी पड़ती जो निश्चय ही गुरूकुल का सत्यानाश कर देतीं।

भारत में आदर्श शिक्षा पद्धति की खोज करने के इच्छुक व्यक्तियों से आग्रह है कि वो गुरूकुल कांगड़ी के इतिहास व उपलब्धियों का अध्ययन अवश्य करें।