14.9.06

पूर्वी दिल्ली में हिन्दी माध्यम विद्यालय

आगामी अक्तूबर में मैं 3 सप्ताह के लिए भारत आ रहा हूं। इस यात्रा का एक मुख्य उद्देश्य है अपने पौने चार साल के बेटे विष्णु को किसी अच्छे हिन्दी माध्यम के विद्यालय में दाखिला दिलवाना। मेरी इच्छा यह है कि वो छ: महीने यानि अक्तूबर व मार्च के बीच में नर्सरी की पढ़ाई पूरी कर ले ताकि उसका एक वर्ष खराब न हो।

इस के लिए मुझे पूर्वी दिल्ली में एक अच्छे हिन्दी माध्यम विद्यालय की खोज है। अपने दिल्ली के रिश्तेदारों व मित्रों से कुछ खास जानकारी नहीं मिल पा रही है। आप में से किसी मित्र को इस बारे में कुछ जानकारी हो तो कृपया बताएं। मैं यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हो पा रहा हूं कि अब हिन्दी माध्यम में पढ़ाई करवाने के लिए मुझे अपने बेटे को दिल्ली के किसी दूसरे कोने में भेजना पड़ेगा।

क्या आप मदद कर सकते हैं?

संरक्षकता (ट्रस्टीशिप) का सिद्धान्त

आजादी के 60 वर्ष पूरे होते−होते देश में भुखमरी के दर्शन होने लगे हैं। अनेक सर्वेक्षण किए गए हैं और लगभग सभी इसी बात की ओर इंगित करते हैं कि भारत में आजादी के बाद व विशेष तौर पर उदारीकरण के बाद अमीरों व गरीबों के बीच खाई बढ़ी है। करोड़पतियों की संख्या बढ़ी है तो दूसरी ओर भुखमरी व गरीबी जनित आत्महत्याएं भी बढ़ी हैं। इन समस्याओं को लेकर जहां राजनेता वोटों की राजनीति में लगे हैं, तो दूसरी ओर नक्सलवाद सिर उठा रहा है। पड़ौसी देश नेपाल में तो माओवाद के नाम पर एक बड़ी शक्ति का उदय होता भी दिखाई दे रहा है।

भूख एवं गरीबी के कारण किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं को टी•वी• पर हमारे कृषि मन्त्री चाहे सामान्य घटना बता दें, परन्तु वास्तविकता यह है कि शस्य श्यामला हमारी भारत माता में अपनी सन्तानों का पालन करने का सामर्थ्य आज भी बरकरार है। समस्या इतनी ही है कि भारत माता हमें जो कुछ भी देती है, उसे कुछ प्रभावी लोग हड़प लेते हैं और गरीब लोगों को कुछ नहीं मिल पाता।

आम तौर पर कठिन दिखने वाली समस्याओं का हल बहुत आसान होता है। इस समस्या का हल भी कुछ विशेष कठिन नहीं है। जिस किसी को भी विरासत में या उद्योग −व्यवसाय द्वारा प्रचुर सम्पत्ति मिल जाए, वह उस सम्पत्ति में से अपने गुजारे भर का लेकर शेष पर राष्ट्र का हक समझे। ऐसा करने से जहां व्यक्ति गैर−जरूरी लालच से अपनी रक्षा कर सकेगा, वहीं समाज में सम्पन्नता व भाईचारा बढ़ेगा। नक्सलवाद जैसे प्रतिक्रियावादी आन्दोलनों की आवश्यकता नहीं रह जाएगी एवं सब लोग सामूहिक विकास कर सकेंगे। ‘त्यागपूर्वक भोग भोगना’ ही संरक्षता का सिद्धान्त है।

ईशावास्योपनिषद में भी गाया गया है :
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्यस्विद् धनम्।।
अथार्त् इस जगत में सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है, इसलिए त्यागपूर्वक इसे भोगते रहो। धन आदि भोग्य पदार्थ किसी के भी नहीं हैं।

आजकल तो हर एक व्यक्ति पड़ौसी की चिन्ता किए बिना अपने लिए ही जीता है। सर्वकल्याणकारी नवीन जीवन पद्धति का विकास करना हो तो उसका सबसे निश्चित मार्ग संरक्षता का सिद्धान्त ही है। साम्यवाद अथवा नक्सलवाद द्वारा पोषित ऐसी जड़ समानता को भारतीय चित्त स्वीकार नहीं कर सकता जिसमें कोई अपनी योग्यताओं का पूरा उपयोग ही न कर सके। भारत में तो हर एक को करोड़ों रूपए कमाने की स्वतन्त्रता होनी ही चाहिए, लेकिन इस सारे धन का उद्देश्य सर्व कल्याण में समर्पित कर देने का ही होना चाहिए।

अब प्रश्न यह है कि इस तरह के सच्चे संरक्षक (ट्रस्टी) कितने हो सकते हैं। बहुतेरे लोग इस सिद्धान्त को अव्यावहारिक मान लेते हैं। वें देख नहीं पाते कि आज भी ऐसे उदाहरणों से हमारा समाज भरा पड़ा है जो सच्चे अर्थों में ट्रस्टीशिप के सिद्धान्त का पालन कर रहे हैं। दूसरी बात यह भी कि अगर सिद्धान्त ठीक हो तो हमें यह देखने की बजाय कि इसका पालन कितने लोग कर रहे हैं, हमें यह देखना चाहिए कि किस प्रकार इस सिद्धान्त को हम अपने जीवन में अपना सकते हैं। संख्या बल से ही हम किसी सिद्धान्त के सही या गलत होने का निर्णय नहीं कर सकते।

लोग स्वेच्छा से संरक्षक बनें तो यह बहुत अच्छा होगा। अगर वो न बनें तो मेरा खयाल है कि उन्हें संरक्षक बनने के लिए प्रेरित करना चाहिए या फिर अहिंसक तरीकों द्वारा धनियों को या तो उनकी सम्पत्ति से वंचित करना चाहिए।

14.8.06

राष्ट्रपति जी द्वारा सात सूत्रीय शपथ

60वें स्वाधीनता दिवस के उपलक्ष्य में हमारे राष्ट्रपति जी ने युवाओं को सात सूत्रीय शपथ लेने का आह्वान किया है। ये शपथ है :

मैंने तो यह शपथ ले ली है। सब युवाओं से अनुरोध है कि दृढ़तापूर्वक यह शपथ लेकर राष्ट्र एवं जगत को खुशहाल बनाने की ओर अग्रसर हों।

राष्ट्रपति जी से विनम्र अनुरोध है कि वो देश के नेताओं को भी यह शपथ लेने को प्रेरित करें। कितना अच्छा हो कि आफिस आफ प्रोफिट बिल और सूचना के अधिकार वाले बिल जैसी हठधर्मिता छोड़ कर राष्ट्र निर्माण का काम करें। दोनों बिल चौथी एवं पांचवीं शपथ का उल्लंघन प्रतीत होते हैं।

11.8.06

परिचय − गुरूकुल कांगड़ी (भाग 2)

(भाग 1 में हमने गुरूकुल कांगड़ी की स्थापना व दैनिक चर्या के विषय में पढ़ा था। अब हम गुरूकुल के शैक्षणिक स्तर के बारे में पढ़ेंगे। बीसवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में ही एक अमरीकी यात्री श्री मीरोन फिल्पस ने गुरूकुल कांगड़ी के बारे में भारतीय समाचार पत्र पायनियर में कुछ पत्र लिखे थे। प्रस्तुत लेख उन्हीं पत्रों में उपलब्ध तथ्यों पर आधारित है।)

गुरूकुल में नैतिक व धार्मिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता था। गुरूकुल ने इसके लिए विशेष पुस्तकें भी तैयार करवाई थी एवं कुलपति स्वामी श्रद्धानन्द स्वयं इन विषयों पर छात्रों से वार्ता करते थे। छात्रों को पवित्र संस्कृत ग्रन्थो का पठन करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। छात्रों की पाठ्य सामग्री व दैनिक चर्या के आधार पर कहा जा सकता है कि गुरूकुल का वातावरण वेदों व उपनिषदों से लबालब था।

तमाम धार्मिक शिक्षा के साथ−साथ गुरूकुल का आचार्यवर्ग इस बात के लिए भी सजग था कि छात्र दुनिया में निरन्तर हो रही गतिविधियों, नवीन खोजों व उपलब्धियों से अनभिज्ञ न रहें। इसके लिए छात्रों के पाठ्यक्रम में पश्चिमी साहित्य व आधुनिक विज्ञान से सम्बन्धित पुस्तकों को न केवल स्थान दिया गया बल्कि छात्रों को गुरूकुल के पुस्तकालय के माध्यम से नवीनतम पुस्तकें व पत्रिकाएं उपलब्ध भी करवाई गईं।

फिल्पस ने गुरूकुल व अन्य संस्थाओं की दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों के बीच तुलनात्मक विश्लेषण भी किया।
  • विज्ञान - गुरूकुल के छात्र कईं वर्ष आगे हैं। भौतिकी, रसायन शास्त्र व मैकैनिक्स की अनेक गूढ़ पुस्तकों का अध्ययन गुरूकुल में होता है, अन्य संस्थानों में नहीं।
  • गणित - गुरूकुल के छात्र अन्य संस्थानों के छात्रों के समकक्ष हैं।
  • इतिहास - गुरूकुल के छात्रों ने भारतीय व ब्रिटिश इतिहास के 2000 पृष्ठ पढ़े हैं जबकि अन्य संस्थानों के छात्र 400 पृष्ठ ही पढ़ते हैं। इतिहास में यहां के छात्र अन्यत्र बी0ए0 के बराबर हैं।
  • अंग्रेजी - दसवीं में गुरूकुल के छात्र अन्य संस्थानों की दसवीं से पीछे हैं। परन्तु चौदहवीं तक पहुंचते पहुंचते वें अन्य संस्थानों की चौदहवीं के समकक्ष हो जाते हैं।
  • संस्कृत - गुरूकुल के छात्र बहुत आगे हैं। दसवीं के छात्रों की संस्कृत एम0ए0 (अंग्रेजी) के छात्रों की अंग्रेजी के बराबर की है।
  • दर्शन व तर्क शास्त्र - गुरूकुल के छात्र अन्य विद्यालयों से श्रेष्ठ हैं।

फिल्पस लिखते हैं कि गुरूकुल के छात्रों के श्रेष्ठ होने की वजहों में से एक तो शिक्षा के अनुकूल प्राकृतिक वातावरण है, दूसरे वहां के जीवन में नियमितता व अनुशासन है और तीसरे शिक्षा का माध्यम हिन्दी है जिसे भारतीय छात्र आसानी से समझकर ग्रहण कर सकते हैं। हम स्पष्ट देख सकते हैं कि गुरूकुल के संस्थापक गुरूकुल को श्रेष्ठ मार्ग पर चला पा रहे थे। यही कारण था कि महान विभूतियां जैसे महात्मा गान्धी, भूतपूर्व ब्रिटिश प्रधानमन्त्री एन्ड्रयूज, डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद व जवाहर लाल नेहरू गुरूकुल से विशेष स्नेह रखते थे और इसलिये उन्होंने गुरूकुल की यात्राएं भी की।

इसके बावजूद गुरूकुल को सरकारी मदद न मिल सकती थी। ऐसा नहीं था कि गुरूकुल को विदेशी सरकार से मदद की अपेक्षा थी पर सामान्य तर्क तो यही कहता है कि समाजोपयोगी कार्य करने वाली ऐसी संस्थाओं को मदद दी जानी चाहिए। फिल्पस के अनुसार सरकारी मदद पाने के लिए गुरूकुल को संस्कृत के स्थान पर अंग्रेजी रखनी पड़ती, जो गुरूकुल को स्वीकार नहीं था। इसके साथ−साथ गुरूकुल को अपनी स्वयं की पुस्तकों के स्थान पर सरकारी पुस्तकें पढ़ानी पड़ती जो निश्चय ही गुरूकुल का सत्यानाश कर देतीं।

भारत में आदर्श शिक्षा पद्धति की खोज करने के इच्छुक व्यक्तियों से आग्रह है कि वो गुरूकुल कांगड़ी के इतिहास व उपलब्धियों का अध्ययन अवश्य करें।

4.8.06

परिचय − गुरूकुल कांगड़ी (भाग 1)

“कुछ बात ऐसी है कि मिटती नहीं हस्ती हमारी”। एक हजार वर्षों की दासता के बावजूद भारत अपनी संस्कृति को बचा सका है। हमारे पूर्वजों के पुण्यों का प्रताप कुछ ऐसा है कि आज भी ऋषियों व मुनियों की कड़ी में अनवरत नई कड़ियां जुड़ रही हैं, जो हमारी संस्कृति को नया जीवन प्रदान करती हैं।

आज से लगभग 100 वर्ष पूर्व ऐसे ही एक कर्मयोगी व ऋषि व्यक्तित्व महात्मा मुंशीराम (कालान्तर में स्वामी श्रद्धानन्द) ने हरिद्वार के निकट गुरूकुल कांगड़ी की स्थापना की थी। महात्मा मुंशीराम व उनके आर्य समाजी मित्रों की काफी समय से इच्छा थी कि तक्षशिला गुरूकुल के जैसा एक गुरूकुल शुरू हो, जो भारतीय संस्कृति की न केवल रक्षा करे अपितु नवीन शास्त्रों की रचना करके इस संस्कृति को नवपल्लवित भी कर सके। वैदिक धर्म को हर घर में पहुंचा सकने योग्य प्रचारकों का निर्माण हो व ऋषियों की इस भूमि के नागरिक उच्चतम आदर्शों को पुन: आचरण में लाने का उद्यम करें।

दुभार्ग्यवश धनाभाव व पर्याप्त साहस के अभाव के कारण यह कार्य कईं वर्षो तक टलता रहा, जब तक कि महात्मा मुंशीराम, जो पेशे से वकील थे, ने अपनी वकालत छोड़ कर धन एकत्रित करने का बीड़ा उठाया। अपना सर्वस्व उन्होंने गुरूकुल को समर्पित कर दिया व दर−दर जाकर पैसा इकठ्ठा करने लगे। उनके मित्रों ने ही उन्हें पागल व सनकी समझना शुरू कर दिया, पर मुंशीराम का निश्चय पक्का था।

अस्तु। मुठ्ठी भर छात्रों के साथ 1902 ईस्वी में गुरूकुल का शुभारम्भ हुआ। काम कठिन था। जिस समाज में योग्यता का मापदण्ड मात्र व्यक्ति के धन कमाने की क्षमता बन गया हो व सांसारिक सफलता ही एकमात्र ल्क्ष्य माना जाता हो, ऐसे समाज में हिन्दी माध्यम से पुरातन तरीकों द्वारा शिक्षा प्रदान करने का कार्य निश्चय ही जोखिम भरा था। लेकिन मुंशीराम जानते थे कि जितना महान लक्ष्य होगा, उतना ही अधिक जोखिम होगा और उतनी ही अधिक कीमत भी चुकानी होगी।

गुरूकुल की चर्या: गुरूकुल में सात वर्ष की आयु के बच्चों को 16 वर्षों के लिए प्रवेश मिलता था। छात्रों को इन सोलह वर्षों के लिए गरीबी, ब्रह्मचर्य व अनुशासन की प्रतिज्ञा करनी होती थी। वर्तमान समाज की दृष्टि से देखें तो एक अति कठोर नियम था − छात्र इन 16 वर्षों तक अपने घर नहीं जा सकते थे। उनके माता पिता ही उनसे मिलने के लिए माह में एक बार आ सकते थे। इस नियम के बावजूद उन्हें अच्छे छात्र भी मिले व देश विदेश में प्रशंसक भी मिले। अपनी स्थापना के 15 वर्ष के भीतर ही यह इतना प्रसिद्ध हो गया था कि गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो उनके मन में भी इस गुरूकुल को देखने की तीव्र इच्छा थी।

छात्रों का दिन हर रोज प्रात: 4 बजे से रात्रि 9 बजे तक चलता था। सुबह व सायं की पूजा, हवन व सुभाषितों का पाठ के अतिरिक्त साढ़े छ: घण्टे की कक्षा लगती थी। लगभग प्रतिदिन सुबह की प्रार्थना के बाद अवैतनिक कुलपति मुंशीराम से नैतिक शिक्षा विषयक परिचर्चा होती थी व सायं की प्रार्थना से पूर्व मैदान में खेल खेले जाते थे। बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए अगस्त सितम्बर की छुट्टियों के दौरान शिक्षकवर्ग छात्रों को अपने साथ भारत के विभिन्न भागों में शैक्षणिक यात्राएं कराने ले जाता था।

(भाग 2 में आगे − गुरूकुल में शिक्षा की पद्धति एवं शिक्षा का स्तर)