आभा, तुम्हे जन्मदिन की बहुत बधाइयां। आज इकत्तीस वर्ष की हो गयी हो, जिस में से आठ साल तुम ने मुझे दिए हैं।
२८ अक्तूबर, १९९९ - कल की ही बात लगती है, जब हम पहली बार मिले थे। तब से लेकर अब तक ये ख्याल अनेकों बार मेरे मन में आया है कि काश! हम पहले मिलते तो मैं तुम्हारा बचपन भी देख पाता। जवानी का बचपना तो देख लिया, बचपन का बचपना रह गया। खैर ...
हमारे मिलने के एक सप्ताह बाद ही मुझे TCS में समय से पहले पदोन्नति मिल गयी। तुम मेरे लिए भाग्यशाली साबित हुयी। फिर शादी के बाद तुम्हारे साथ देश-विदेश देखने को मिला। तुमने मुझे घर दिया, और दो बहुत ही special बच्चे विष्णु व गरिमा दिए। विष्णु की देखभाल के लिए तुमने TCS की अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूर्णकालिक गृहस्थी में ध्यान लगा लिया। समय कि आवश्यकता के अनुसार तुमने जो निर्णय लिया, उस पर मुझे तुम पर गर्व है। बच्चों के आत्मनिर्भर बनने के बाद तुम अपना कैरीअर आगे बढाओ, यह हम दोनो की ही इच्छा है।
तुम्हारी सब से खास बात जो मुझे लगती है कि तुम मेरी धर्म पत्नी हो, मात्र पत्नी नहीं। धर्म के मार्ग पर चलाने वाली, धर्म की व्याख्या करने वाली और निर्भीक व स्पष्ट राय देने वाली आभा - तुमने मुझे सदा सही राह दिखाई है। अपनी कमजोरियों के वशीभूत मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी, जिनका मुझे असीम दुःख होता है। आर्मी कैंटीन का सामान बरतना और हिन्दी माध्यम इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने कि राह में शुरूआती असफलताओं से घबरा कर पलायन - इन दोनों गलतियों से मैं दिन रात कष्ट पाता हूँ क्योंकि इन घटनाओं ने मेरे आत्म विश्वास को भीतर से खोखला कर दिया है। लेकिन तुमने दोनों बार मुझे न केवल सही राह दिखाई थी, बल्कि सही राह चुनने का दबाव भी बनाया था।
शादी के बाद मैं तुम्हें जीवन के सुब सुख देना चाहता था। मुझे याद है मैंने तुम्हे एक कार्ड दिया था, जिसमे लिखा था - "I want a life for us which will be better than all our previous lives". हमने कोशिश भी की लेकिन सच्चाई का मार्ग छोड़ते ही हमारे सुख के दिन छिन गए। भोग बढ़ गया और भजन छूट गया। आज के इस महत्त्वपूर्ण दिन मैं तुम्हे यही उपहार देना चाहता हूँ कि मैं क्रोध, आलस्य और पर-उपहास - ये तीन दुर्गुण छोड़ रहा हूँ। आशा है कि तुम्हें यह उपहार अच्छा लगेगा।
आज के दिन स्वामी विवेकानन्द की लिखी इस कविता के माध्यम से तुम्हे शुभकामनाएं देता हूँ:
The mother's heart, the hero's will,
The softest flower's sweetest feel;
The charm and force that ever sway
The altar fire's flaming play;
The strength that leads, in love obeys;
Far-reaching dreams, and patient ways,
Eternal faith in Self, in all
The sight Divine in great in small;
All these, and more than I could see
Today may "Mother" grant to thee।
25.12.07
विष्णु की पढाई
दीवाली की छुट्टियों में जब मैं डेनमार्क से भारत आया तो दिल्ली में घर के निकट कोई अच्छा हिन्दी माध्यम का विद्यालय ढूँढा। मेरे आश्चर्य एवं दुःख की सीमा न थी जब मैंने पाया कि कोई ऐसा विद्यालय है ही नहीं। नॉएडा में एक विद्यालय ऐसा मिला, पर चूँकि उनकी बस घर के पास तक नहीं आती थी इसलिए वह भी उपयुक्त नहीं जान पड़ा। वसुंधरा एन्क्लेव में ममता पब्लिक स्कूल में विष्णु का दाखिला करवाया, जो अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देता है।
ममता पब्लिक स्कूल में जल्द ही विष्णु का मन लग गया और उसने हिन्दी, अंग्रेजी वर्णमाला सीख ली। सौ तक अंग्रेजी गिनती भी सीख ली। फरवरी २००७ में जब विष्णु को स्कूल जाते हुए मात्र चार महीने हुए थे तो स्कूल के वार्षिक उत्सव में विष्णु ने सामुहिक नृत्य के कार्यक्रम में हिस्सा लिया। हम देखने गए और विष्णु का नृत्य देख कर बहुत खुश हुए। जो चीज खली वो थी बोलीवुड का बोल-बाला। छोटे छोटे बच्चे बोलीवुड के "कजरारे नैना" और "It's the time to disco" आदि पर नाच रहे थे। मेरे विचार से संस्कारित गीत एवं अन्य कार्यक्रम होने चाहियें और यह बात मैंने स्कूल की प्रधानाचार्या श्रीमती ममता वालिया के सामने रखी। प्रधानाचार्या ने मेरी बात सूनी और अपनी बेबसी कुछ इस प्रकार से दिखाई - "आज कल बच्चों को यही अच्छा लगता है, हम क्या करें।" मैं दुखी मन से घर लौटा।
अप्रैल २००७ में विष्णु का दाखिला नॉएडा के सरस्वती शिशु मंदिर में कराया। इस स्कूल की बस हमारे घर के नजदीक नहीं आती थी इसलिए सुबह ऑफिस जाने से पहले मैं विष्णु को स्कूल छोड़ने जाने लगा। दोपहर को विष्णु को लाने की जिम्मेवारी मेरी पत्नी आभा ने संभाल ली। गर्मी के दिनों में एक वर्ष की बेटी को घर पर आया के पास छोड़ कर आभा विष्णु को लेने जाती थी। इस छोटे से कष्ट के सामने बड़ी ख़ुशी हमारे सामने ये थी कि विष्णु को अच्छे संस्कार मिलने लगे। स्कूल पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का असर होने के कारण विष्णु को अनुशासन और बड़ों का सम्मान करना आदि गुण मिलने लगे। लेकिन हमें हैरानी तब हुई जब हम ने देखा की हिन्दी माध्यम विद्यालय में गणित अंग्रेजी भाषा में पढाया जाता है। अंग्रेजी गिनती और अंग्रेजी पहाडे देख कर मेरा माथा ठनक गया, पर अब कुछ कर नहीं सकता था। विष्णु सात महीने उस स्कूल में रहा और उस ने हिन्दी वाक्य पढ़ना / लिखना, अंग्रेजी के कुछ शब्द और गणित में ४ तक पहाडे सीख लिए.
फिर मैं परिवार सहित यहाँ इंग्लैंड आ गया हूँ। विष्णु यहाँ अंग्रेजी माध्यम के एक स्कूल में जा रहा है। उसकी आयु के बच्चे अभी अंग्रेजी वर्णमाला और २० तक गिनती सीख रहे हैं। विष्णु उनकी तुलना में काफी आगे है, पर अंग्रेजी बोलना उस ने अभी सीखना शुरू किया है.
ममता पब्लिक स्कूल में जल्द ही विष्णु का मन लग गया और उसने हिन्दी, अंग्रेजी वर्णमाला सीख ली। सौ तक अंग्रेजी गिनती भी सीख ली। फरवरी २००७ में जब विष्णु को स्कूल जाते हुए मात्र चार महीने हुए थे तो स्कूल के वार्षिक उत्सव में विष्णु ने सामुहिक नृत्य के कार्यक्रम में हिस्सा लिया। हम देखने गए और विष्णु का नृत्य देख कर बहुत खुश हुए। जो चीज खली वो थी बोलीवुड का बोल-बाला। छोटे छोटे बच्चे बोलीवुड के "कजरारे नैना" और "It's the time to disco" आदि पर नाच रहे थे। मेरे विचार से संस्कारित गीत एवं अन्य कार्यक्रम होने चाहियें और यह बात मैंने स्कूल की प्रधानाचार्या श्रीमती ममता वालिया के सामने रखी। प्रधानाचार्या ने मेरी बात सूनी और अपनी बेबसी कुछ इस प्रकार से दिखाई - "आज कल बच्चों को यही अच्छा लगता है, हम क्या करें।" मैं दुखी मन से घर लौटा।
अप्रैल २००७ में विष्णु का दाखिला नॉएडा के सरस्वती शिशु मंदिर में कराया। इस स्कूल की बस हमारे घर के नजदीक नहीं आती थी इसलिए सुबह ऑफिस जाने से पहले मैं विष्णु को स्कूल छोड़ने जाने लगा। दोपहर को विष्णु को लाने की जिम्मेवारी मेरी पत्नी आभा ने संभाल ली। गर्मी के दिनों में एक वर्ष की बेटी को घर पर आया के पास छोड़ कर आभा विष्णु को लेने जाती थी। इस छोटे से कष्ट के सामने बड़ी ख़ुशी हमारे सामने ये थी कि विष्णु को अच्छे संस्कार मिलने लगे। स्कूल पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का असर होने के कारण विष्णु को अनुशासन और बड़ों का सम्मान करना आदि गुण मिलने लगे। लेकिन हमें हैरानी तब हुई जब हम ने देखा की हिन्दी माध्यम विद्यालय में गणित अंग्रेजी भाषा में पढाया जाता है। अंग्रेजी गिनती और अंग्रेजी पहाडे देख कर मेरा माथा ठनक गया, पर अब कुछ कर नहीं सकता था। विष्णु सात महीने उस स्कूल में रहा और उस ने हिन्दी वाक्य पढ़ना / लिखना, अंग्रेजी के कुछ शब्द और गणित में ४ तक पहाडे सीख लिए.
फिर मैं परिवार सहित यहाँ इंग्लैंड आ गया हूँ। विष्णु यहाँ अंग्रेजी माध्यम के एक स्कूल में जा रहा है। उसकी आयु के बच्चे अभी अंग्रेजी वर्णमाला और २० तक गिनती सीख रहे हैं। विष्णु उनकी तुलना में काफी आगे है, पर अंग्रेजी बोलना उस ने अभी सीखना शुरू किया है.
16.12.07
ब्लागिंग फिर शुरु
एक साल से ज्यादा हो गया, ब्लाग पर कुछ लिखा ही नहीं। दिसम्बर २००६ में दो वर्ष डेनमार्क रहने के बाद भारत लौट गया। दिल्ली में गृहस्थी फिर से शुरु की, पुत्र विष्णु की पढ़ाई और अपने हिन्दी माध्यम में इन्जीनियरिंग कॉलेज शुरू करने के प्रयासों में वयस्त हो गया। जो थोड़ा समय मिलता, वह मित्रों व रिश्तेदारों से मिलने में निकल जाता। ब्लाग पर लिखना बन्द हो गया।
लगभग एक वर्ष बाद अब मैं ब्रिटिश टेलीकाम (British Telecom) के एक प्रोजेक्ट पर इपस्विच (Ipswich) इंगलैण्ड आ गया। अब जब कि मैं यहां settle हो गया हूं तो लगता है कि पुनः ब्लाग पर लिखना शुरू कर सकता हूं।
पिछले एक वर्ष में काफी कुछ घटित हुआ, जिसके बारे में लिखना चाहता हूं। विष्णु की तथाकथित हिन्दी माध्यम स्कूल में पढ़ाई, अपने इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करने के प्रयास और निराशा व निरुत्साह के दौर के बारे में शीघ्र ही लिखूंगा।
लगभग एक वर्ष बाद अब मैं ब्रिटिश टेलीकाम (British Telecom) के एक प्रोजेक्ट पर इपस्विच (Ipswich) इंगलैण्ड आ गया। अब जब कि मैं यहां settle हो गया हूं तो लगता है कि पुनः ब्लाग पर लिखना शुरू कर सकता हूं।
पिछले एक वर्ष में काफी कुछ घटित हुआ, जिसके बारे में लिखना चाहता हूं। विष्णु की तथाकथित हिन्दी माध्यम स्कूल में पढ़ाई, अपने इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करने के प्रयास और निराशा व निरुत्साह के दौर के बारे में शीघ्र ही लिखूंगा।
15.12.06
हाफ पैन्ट वाले कहना असभ्यता का परिचय
वर्तमान समाज में से विनम्रता का लोप इस कदर हो गया है कि वैचारिक असहमति होने मात्र से लोग गाली-गलौज पर उतर आते हैं। काफी हद तक तो इस प्रकार का असंयमित व्यवहार राजनेता ही करते हुए पाए जाते है। पर अभी हाल ही में एक अराजनैतिक सज्जन गान्धी जी को बुड्डा कहते हुए मिले। उम्र के लिहाज से व बड़े होने के नाते गान्धी जी को बुड्डा कहना असभ्यता ही कही जा सकती है। कर्मों के लिहाज से गान्धी जी बुड्डे हुए ही नहीं; वो चिर युवा थे। जीवन पर्यन्त युवकों को भी शर्मिन्दा कर जाए ऐसी कर्मठता से काम करते रहे।
खैर यह लेख लिखने का उद्देश्य सिर्फ यह याद दिलाना है कि हम वैचारिक मतभेदों को व्यक्तिगत मतभेदों का रूप देने से बचें। कहा जाता है कि जब गम्भीर चर्चाओं के दौरान आप व्यक्तिगत हमला करने लगते हो तो इसका अर्थ है कि आप चर्चा में हार चुके हो। जैसे खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचती है वैसे आप सामने वाले को नोचने लगते हो।
हाल ही में एक मित्र ने ध्यान दिलाया कि एक जिम्मेदार व्यक्ति जो राजनीति में भी सक्रिय हैं वो राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ को हाफ पैण्ट कह कर सम्बोधित करते हैं। संघ को काफी नजदीक से मैंने भी देखा है व मेरी दृष्टि में संघ के लिए बहुत आदर है। राष्ट्रभक्ति, समाज सेवा, किसी आपदा के समय पीड़ितों की सेवा, वनवासी क्षेत्रों में सेवा कार्य, हिन्दू समाज के उत्थान के लिए अहर्निश प्रयत्नशील, इत्यादि अनेक प्रकल्पों में आदरणीय कार्य करने का श्रेय इस संगठन को दिया जा सकता है। ऐसे सैकड़ों स्वयंसेवक आज भी सेवारत हैं जिन्होंने अपना परिवार छोड़कर आजीवन अविवहित रहते हुए देश सेवा करने का व्रत लिया हुआ है। जब कोई देश के राजनेताओं से त्रस्त होकर कहता है कि भारत को तो भगवान ही चला रहा है तो मेरे मन में इन्हीं सर्वत्यागी व दृढ़निश्चयी जवानों का खयाल आता है। ऐसे स्वयंसेवी लोगों को हाफ पैण्ट कह कर सम्बोधित करना अशोभनीय ही नहीं असभ्य भी है। फिर ऐसी असभ्यता प्रतिक्रियाओं को भी जन्म देती है जिससे समाज में आपसी सौहार्द घटने लगता है।
खैर यह लेख लिखने का उद्देश्य सिर्फ यह याद दिलाना है कि हम वैचारिक मतभेदों को व्यक्तिगत मतभेदों का रूप देने से बचें। कहा जाता है कि जब गम्भीर चर्चाओं के दौरान आप व्यक्तिगत हमला करने लगते हो तो इसका अर्थ है कि आप चर्चा में हार चुके हो। जैसे खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचती है वैसे आप सामने वाले को नोचने लगते हो।
हाल ही में एक मित्र ने ध्यान दिलाया कि एक जिम्मेदार व्यक्ति जो राजनीति में भी सक्रिय हैं वो राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ को हाफ पैण्ट कह कर सम्बोधित करते हैं। संघ को काफी नजदीक से मैंने भी देखा है व मेरी दृष्टि में संघ के लिए बहुत आदर है। राष्ट्रभक्ति, समाज सेवा, किसी आपदा के समय पीड़ितों की सेवा, वनवासी क्षेत्रों में सेवा कार्य, हिन्दू समाज के उत्थान के लिए अहर्निश प्रयत्नशील, इत्यादि अनेक प्रकल्पों में आदरणीय कार्य करने का श्रेय इस संगठन को दिया जा सकता है। ऐसे सैकड़ों स्वयंसेवक आज भी सेवारत हैं जिन्होंने अपना परिवार छोड़कर आजीवन अविवहित रहते हुए देश सेवा करने का व्रत लिया हुआ है। जब कोई देश के राजनेताओं से त्रस्त होकर कहता है कि भारत को तो भगवान ही चला रहा है तो मेरे मन में इन्हीं सर्वत्यागी व दृढ़निश्चयी जवानों का खयाल आता है। ऐसे स्वयंसेवी लोगों को हाफ पैण्ट कह कर सम्बोधित करना अशोभनीय ही नहीं असभ्य भी है। फिर ऐसी असभ्यता प्रतिक्रियाओं को भी जन्म देती है जिससे समाज में आपसी सौहार्द घटने लगता है।
4.12.06
हमें मदद चाहिए
भाषा एवं शिक्षा के सम्बन्ध में विचार करते समय मन में अनेक प्रश्नों का जन्म हुआ। जैसे कि −
• भारत में शिक्षा के लिए मातृभाषा का माध्यम ज्यादा ठीक है या अंग्रेजी (विदेशी) भाषा का माध्यम बेहतर है?
• क्या मातृभाषा में शिक्षा पाने से गणित एवं विज्ञान विषयों को समझने में सहायता मिलती है?
• क्या अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देना अंग्रेजी भाषा पर मजबूत पकड़ की गारण्टी है?
• क्या अंग्रेजी शिक्षा को अनिवार्य बनाने से बच्चों की शिक्षा पर खराब असर पड़ सकता है?
इन प्रश्नों का समाधान करने के लिए हमें निम्नलिखित जानकारी की आवश्यकता है। यह काम अकेले हमारे बस का नहीं है, इसलिए यदि आप मदद कर सकते हैं तो कृपया सम्पर्क करें।
1) पिछले दस वर्षों के दौरान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में प्रथम 10 स्थान पाने वाले छात्रों को किस माध्यम में शिक्षा मिली थी? यदि एक से अधिक माध्यमों से शिक्षा मिली हो तो पांचवी से दसवीं कक्षा के छ: वर्षों के दौरान अधिकांश शिक्षा जिस माध्यम से मिली थी, उसी को शिक्षा का माध्यम माना जाए।
2) ऊपर लिखी जानकारी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में ही प्रथम 50 स्थान पाने वाले छात्रों के लिए भी एकत्रित करनी है।
3) ऊपर लिखी जानकारी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) या केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) मेडिकल प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले छात्रों की भी एकत्रित करनी है।
4) विज्ञान व गणित के शिक्षकों का अनुभव क्या कहता है − क्या शिक्षा के माध्यम से छात्रों की योग्यता पर असर पड़ता है?
5) यदि आप किसी ऐसे छात्र को जानते हैं जो पढ़ तो अपनी मातृभाषा में रहा है, लेकिन अंग्रेजी विषय में कमजोरी के कारण पढ़ाई से विरक्त हो रहा है, तो कृपया हमें उसका नाम व पता भेजिए।
6) ऐसे छात्रों की कमी नहीं जो अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने के बावजूद अंग्रेजी ठीक से नहीं बोल पाते। ऐसे छात्रों से बात करके उनसे पूछना है कि इस का क्या कारण है। यह कारण, छात्र का नाम, पता व कक्षा हमें भेजिए। इस जानकारी के लिए वें ही छात्र चुने जाएं जो कम से कम 5 वर्ष अंग्रेजी माध्यम में पढ़े हों।
7) यदि इस विषय पर पहले से ही कोई भारतीय अथवा विदेशी सर्वेक्षण हुआ हो कृपया उसकी जानकारी भी हमें भेजें।
इस जानकारी के एकत्रित होने पर हम इसे पुस्तक के रूप में व इन्टरनेट पर प्रकाशित करेंगे। हमारा विश्वास है कि यह जानकारी छात्रों व अभिभावकों के लिए अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होगी।
• भारत में शिक्षा के लिए मातृभाषा का माध्यम ज्यादा ठीक है या अंग्रेजी (विदेशी) भाषा का माध्यम बेहतर है?
• क्या मातृभाषा में शिक्षा पाने से गणित एवं विज्ञान विषयों को समझने में सहायता मिलती है?
• क्या अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देना अंग्रेजी भाषा पर मजबूत पकड़ की गारण्टी है?
• क्या अंग्रेजी शिक्षा को अनिवार्य बनाने से बच्चों की शिक्षा पर खराब असर पड़ सकता है?
इन प्रश्नों का समाधान करने के लिए हमें निम्नलिखित जानकारी की आवश्यकता है। यह काम अकेले हमारे बस का नहीं है, इसलिए यदि आप मदद कर सकते हैं तो कृपया सम्पर्क करें।
1) पिछले दस वर्षों के दौरान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में प्रथम 10 स्थान पाने वाले छात्रों को किस माध्यम में शिक्षा मिली थी? यदि एक से अधिक माध्यमों से शिक्षा मिली हो तो पांचवी से दसवीं कक्षा के छ: वर्षों के दौरान अधिकांश शिक्षा जिस माध्यम से मिली थी, उसी को शिक्षा का माध्यम माना जाए।
2) ऊपर लिखी जानकारी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में ही प्रथम 50 स्थान पाने वाले छात्रों के लिए भी एकत्रित करनी है।
3) ऊपर लिखी जानकारी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) या केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) मेडिकल प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले छात्रों की भी एकत्रित करनी है।
4) विज्ञान व गणित के शिक्षकों का अनुभव क्या कहता है − क्या शिक्षा के माध्यम से छात्रों की योग्यता पर असर पड़ता है?
5) यदि आप किसी ऐसे छात्र को जानते हैं जो पढ़ तो अपनी मातृभाषा में रहा है, लेकिन अंग्रेजी विषय में कमजोरी के कारण पढ़ाई से विरक्त हो रहा है, तो कृपया हमें उसका नाम व पता भेजिए।
6) ऐसे छात्रों की कमी नहीं जो अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने के बावजूद अंग्रेजी ठीक से नहीं बोल पाते। ऐसे छात्रों से बात करके उनसे पूछना है कि इस का क्या कारण है। यह कारण, छात्र का नाम, पता व कक्षा हमें भेजिए। इस जानकारी के लिए वें ही छात्र चुने जाएं जो कम से कम 5 वर्ष अंग्रेजी माध्यम में पढ़े हों।
7) यदि इस विषय पर पहले से ही कोई भारतीय अथवा विदेशी सर्वेक्षण हुआ हो कृपया उसकी जानकारी भी हमें भेजें।
इस जानकारी के एकत्रित होने पर हम इसे पुस्तक के रूप में व इन्टरनेट पर प्रकाशित करेंगे। हमारा विश्वास है कि यह जानकारी छात्रों व अभिभावकों के लिए अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होगी।
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