19.4.11

झंझावत

दिमाग में काफी कुछ चल रहा है. जीवन को उपयोगी कैसे बनाया जाए? समय समय पर जीवन को दिशा देने की कोशिश की है - एक राह पकड़ कर चलने की, लेकिन हर बार कमजोर साबित हुआ हूँ. एक बार मन में आया भी कि शायद मैं कमजोर ही हूँ, और जीवन का सबसे अच्छा उपयोग यही है कि ईमानदारी से गृहस्थ पालन करता चलूँ. लेकिन उस से मन को थोड़े समय के लिए ही तसल्ली मिलती है.

इस जीवन में मेरी सबसे बड़ी पूँजी यही है कि मैं ईमानदारी से अपना समय बिता रहा हूँ. मैंने सब उतार चढाव में सत्य बोलना, और रिश्वत के बिना अपने काम ठीक तरीके से करना जारी रखा है. ट्रेन में TTE को और BSNL के लाइन मैन को पैसे नहीं देना, VIP कोटा से अपनी ट्रेन टिकेट को confirm नहीं करवाना - ऐसे कुछ काम तो अब आदत बन गए हैं.
फिर भी कुछ बातें उद्वेलित करती रहती हैं, जिन के लिए न तो कुछ करता हूँ और न ही करने की ख्वाहिश छोड़ पता हूँ:

1. बाबुओं और नेताओं द्वारा भ्रष्ट आचरण
2. अंग्रेजी को अन्य भाषाओं की तुलना में वरीयता
3. विनम्रता और निष्काम कर्म की कमी

जब से अनुपम जी ISKCON में व्यस्त हुए हैं, मेरे भीतर की भक्ति और समर्पण के भाव जाग रहे हैं. भक्तों का संग अच्छा लगता है और उनकी विनम्रता और प्रेम मुझे प्रेरणा दे रहा है. इसी प्रेरणा का परिणाम ये झंझावत है, जो मेरे दिल और दिमाग में चल रहा है.

उम्मीद करता हूँ की भक्तों का साथ मुझे दिशा भी दिखाएगा और एक राह पकड़ कर चलने का साहस भी देगा.