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17.6.11

मेरी हरिद्वार यात्रा

रविवार (१२ जून) को जब मैंने पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार में प्रवेश किया तो मन में स्वामी रामदेव के स्वास्थ्य को लेकर चिंता तो थी, पर साथ ही यह कामना भी थी की रामदेव जी (एक संन्यासी) ने इस अनशन को "आमरण अनशन" कहा है तो इस अनशन को तब तक समाप्त नहीं करना चाहिए जब तक सब मांगे मान नहीं ली जाती. इन दो विरोधाभासी विचारों के बीच ही मन कह रहा था कि बाबा रामदेव आज अनशन तोड़ देंगे, जिसका भरोसा श्री श्री रविशंकर एक दिन पहले जता चुके थे.

मेरे लिए हरिद्वार जाना एक महत्त्वपूर्ण निर्णय था. TCS में अपने काम को छोड़ कर निकलना मेरे बॉस राजेश ने कुछ आसान बना दिया, क्योंकि राजेश स्वयं एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं तथा दुनिया में चल रहे विभिन्न आन्दोलनों के प्रति अपना वैयक्तिक मत रखते हैं. मैंने जब हरिद्वार जाने का फैसला किया तो मुझे नहीं मालूम था कि यह आन्दोलन कितना लम्बा चलेगा, परन्तु मेरा निश्चय था कि विजय मिलने से पहले लौटूंगा नहीं. मेरी पत्नी आभा मेरे लम्बे समय तक आन्दोलन से जुड़ने के पक्ष में नहीं थी और मेरे पिताजी तो एक दिन के लिए भी जुड़ना परिवार व TCS के प्रति गैरजिम्मेदारी व बेवकूफी भरा निर्णय बता रहे थे. खैर, मैं पतंजलि योगपीठ पहुँच चुका था और उम्मीद कर रहा था कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध यह आन्दोलन भारत के लिए एक एतिहासिक क्षण ला पायेगा.

योगपीठ में यज्ञशाला नामक स्थान पर आन्दोलनकारियों व मीडियाकर्मियों के बैठने की व्यवस्था की गयी थी. कुल ५०-६० लोग रहे होंगे, जो टीवी के माध्यम से आन्दोलन की खबरें पा रहे थे. मेरे ख्याल से आन्दोलन के नेताओं को आन्दोलनकारियों से सीधा संवाद स्थापित करना चाहिए था. अनशन टूटने की खबर भी वहां टीवी के माध्यम से ही पहुंची, जो कि मेरी हरिद्वार यात्रा की पहली बड़ी निराशा थी. अनशन टूटना स्वयं एक बढ़ी निराशा थी ही.

खैर मुझे कुल मिला कर अपना हरिद्वार आना व्यर्थ लगा क्योंकि मैं समझ चुका था कि यह आन्दोलन अब कुछ समय के लिए तो अपनी ऊर्जा खो ही देगा. तभी मैंने अपने बॉस राजेश को इस आशय का सन्देश भेजा कि मेरी वापसी जल्द ही होगी. दोपहर के भोजन के बाद मैंने कईं कार्यकर्ताओं से बात कि और दो प्रश्न पूछे - (१) अनशन टूटने के बाद अब इस सत्याग्रह का अगला कदम क्या होगा?, (२) मैं आन्दोलन में योगदान देना चाहता हूँ, इसलिए मुझे स्वयंसेवकों के दल में शामिल होने के लिए क्या करना होगा? स्वयंसेवक के तौर पर मैंने सफाई से लेकर कंप्यूटर के किसी काम को करने के लिए अपनी तैयारी दिखाई. दोनों में से किसी भी प्रश्न का जवाब संतोषजनक नहीं मिला. मुझे आचार्य जी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के लौटने तक इंतज़ार करने कि सलाह दी गयी और खाली बैठने को कहा. शाम को आखिरकार अपने प्रयास में मुझे थोड़ी सफलता मिली जब मुझे यज्ञशाला के निकट कुर्सियां तरतीब से लगाने का काम दिया गया.

किसी को मालूम नहीं था कि स्वामी जी कब लौटेंगे, पर सब इंतज़ार कर रहे थे. योगपीठ के अन्य सब काम तथा आयुर्वेदिक अस्पताल अपना नियमित काम कर ही रहे थे. सोमवार का सारा समय इस इंतज़ार में बीता कि शायद स्वामी जी आ ही जाएँ. स्टार न्यूज़ के एक व्यक्ति से बात करके पता चला कि स्वामी जी के अगले दिन सुबह ही आने कि संभावना है. स्वयंसेवा के लिए कोई मौका न देख कर मैंने पुस्तकालय में २ घंटे बिताये. योगपीठ का पुस्तकालय काफी समृद्ध है और विशेषतः हिंदी भाषा की पुस्तकों की अच्छी collection है. उन पुस्तकों को देख कर अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गौरव का एहसास हुआ तथा मन किया की वहां बैठ कर गंभीर अध्ययन करूं. लेकिन मैं जानता था कि अध्ययन का मौका अभी नहीं है.

शाम को मुझे योगपीठ के फेस २ में राजीव भवन जाकर विनोद जी से मिलने को कहा गया. विनोद जी शायद सूचना तकनीकी के लिए वहां कुछ setup कर रहे हैं और मेरी पृष्ठभूमि को देखते हुए शायद यह सोचा गया होगा कि मैं वहां कुछ स्वयंसेवा कर सकूंगा. मैं तुरंत राजीव भवन पहुंचा, जो कि भारत स्वाभिमान के श्री राजीव दीक्षित कि पावन स्मृति में बनाया गया है. ये वही राजीव दीक्षित हैं, जिनके भाषणों को सुनने के लिए १९९८-९९ में हम मुंबई में घूमते थे और जिनकी राष्ट्रनिष्ठा और देशभक्ति से प्रेरणा पाते थे. विनोद जी से जब मैं मिला तो मैंने पाया कि उनके पास मुझे देने को कोई काम नहीं है. शाम का समय था, इसलिए उन्होंने कहा कि अगले दिन सुबह वो मुझे कुछ बता सकेंगे. मैंने कहा कि मैं रात को भी जो काम बोलेंगे, वो करने को तैयार हूँ, पर विनोद जी ने कहा कि अभी वो एक आवश्यक बैठक के लिए निकल रहे हैं, इसलिए सुबह ही बता पायेंगे. मैंने उनसे एक प्रार्थना और की कि भारत स्वाभिमान "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के मुद्दे पर जो कुछ काम कर रही है, मुझे उसकी जानकारी चाहिए. विनोद जी ने अगले दिन सुबह ९ बजे से पहले मुझे फोन पर बात करके दिशा दिखाने का भरोसा जताया और मेरा फोन नंबर ले लिया.

अगले दिन सुबह मुझे कोई फोन नहीं आया. पता लगा कि स्वामी जी हरिद्वार लौट आये हैं और ११:३० बजे के करीब दर्शन देंगे. मैं तुरंत यज्ञशाला पहुंचा कि शायद सत्याग्रह की भावी दिशा का पता लग सकेगा. वहां उस समय लगभग ४००-५०० लोग थे, तभी सूचना जारी हुई कि स्वामी जी अस्पताल के OPD हॉल में दर्शन देंगे. सुब लोग यज्ञशाला से निकल कर OPD हॉल में पहुंचे; मैं भी पहुंचा. इस पूरे समय में मैंने देखा कि यज्ञशाला के आसपास का जो तामझाम (टेंट, कुर्सियां, इत्यादि) था, उसे उठवाया जा रहा है. बाबा रामदेव कि प्रतीक्षा में हम बैठे थे, जब मंच से किसी ने घोषणा की कि सत्याग्रह जारी रहेगा और सब लोग अपने-अपने जिलों में लौट कर वहीँ से सत्याग्रह में भाग लें.

कोई १ घंटे की प्रतीक्षा के बाद स्वामी रामदेव पहुंचे. मैंने पहली बार उन्हें प्रत्यक्ष देखा था. शरीर से कमजोर, लेकिन चुस्त. चेहरे पर शांति व सौम्यता विराजमान थी. मंच पर पहुँच कर उन्होंने कुछ वरिष्ठ संतों के चरण छुए. कुछ अन्य संतों ने स्वामी जी के चरण छुए. स्वामी जी पर पुष्पवर्षा की गयी, और कार्यकर्ताओं ने "भारत माता की जय" और "वन्दे मातरम्" के नारों से माहौल गुंजा दिया. बिना कोई शब्द बोले स्वामी जी मंच से चले गए.

मुझे अभी भी सत्याग्रह की भावी दिशा का पता नहीं चला था. मैं वहां पहुंचा जहां से मीडिया के लोग रिपोर्ट कर रहे थे. कुछ लोगों में कैमरे के सामने खड़े होने की लालसा देखी, पर मैं दूर खड़ा हो कर सुनने की कोशिश कर रहा था कि क्या बताया जा रहा है. पता लगा कि सत्याग्रह को लेकर भ्रम की स्थिति है और ऐसी अफवाहें उड़ रही हैं कि स्वामी जी ने ८-१० दिन का मौन धारण किया है. मेरी इच्छा थी कि मैं मीडिया से पूछूं कि वो इस आन्दोलन के मुद्दों पर चर्चा करने की बजाय इस पर ध्यान क्यों लगा रहे हैं कि बाबा के पीछे कौन है, पर मैं अपने स्वयं के संकोच के कारण यह पूछ न पाया.

वहां से निपटने के बाद लगभग २ बजे मुझे एक ब्रह्मचारी मिले, जिन्होंने अपना जीवन बाबा की सेवा में समर्पित कर दिया है. उन्होंने बताया कि ऐसे लगभग १५० युवक-युवतियां हैं जिन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहते हुए भारत स्वाभिमान का काम करने की कसम खाई है. उन ब्रह्मचारी को जब मैंने बताया कि मुझे कुछ दिनों से सत्याग्रह की कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है, तो उन्होंने खेद प्रकट किया और कहा कि ऐसी व्यवस्था नहीं की जा सकी, जिस से मुझ जैसे लोगों को मार्गदर्शन दिया जा सके. "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के विषय में उनका कहना था कि सरकार को ही इस दिशा में पहल करनी होगी (जिस के बारे में मेरा मत कुछ भिन्न है). उन्होंने अपने एक सहयोगी को कहा कि मुझे स्वामी मुक्तानंद से मिलवा दे. उनके सहयोगी थोडा घबराये, जिस से मैंने अंदाजा लगाया कि स्वामी मुक्तानंद जी शायद काफी वरिष्ठ हैं. मैं उनके साथ स्वामी मुक्तानंद कि खोज में निकला. थोड़ी देर में भगवे वस्त्रों में एक स्वामी मिले, जो सब कार्यकर्ताओं को योगपीठ के फेस २ में जाने को कह रहे थे. बाद में पता चला कि वही स्वामी मुक्तानंद थे. मैं फटाफट से खाना खाकर फेस-२ में पहुंचा, इस उम्मीद में कि सब से वहीँ पर मुलाकात होगी. परन्तु दुर्भाग्य से मुझे फेस-२ में कोई नहीं दिखाई दिया. मैं राजीव भवन में जाकर बैठ गया तो वहीँ विनोद जी मिल गए. मैंने शालीनतावश उनसे सुबह ९ बजे फोन न करने का तकाजा नहीं किया, पर यह जरूर कहा कि "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के विषय पर स्पष्टता मिलने से पहले मैं वहां से नहीं लौटूंगा.

विनोद जी मुझे डॉ जयदीप आर्य के कार्यालय में ले गए. डॉ आर्य बाबा के बहुत नजदीकी सहयोगी हैं और मुझे विश्वास था कि वो मेरी सहायता अवश्य करेंगे. लेकिन उनके कार्यालय में एक अन्य सज्जन दिलीप जी बैठे थे, जो शायद कार्यालय को संभालने का काम करते हैं. वो स्वयं भी एक वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं. मैंने उनको अपनी सारी रामकहानी सुनायी, जो उन्होंने कुछ रूचि से व कुछ अरुचि से सुनी. उन्होंने भी यही कहा कि "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के लिए सरकार को ही पहल करनी होगी. उसके बिना वो चाह कर भी कुछ नहीं कर सकेंगे. मैंने कहा कि जनता एवं भारत स्वाभिमान जैसे संगठन भी काफी कुछ कर सकते हैं, इसलिए सरकार के कुछ करने कि "प्रतीक्षा" करना शायद ठीक नहीं होगा, जैसे (१) अंग्रेजी को दिए जाने वाले स्पेशल treatment की खबरों को जनता तक ले जाना, (२) हिंदी में नए शब्द रचना, (३) हिंदी माध्यम में इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करने की दिशा गंभीर पहल करना, ये कुछ काम तुरंत शुरू किये जा सकते हैं. दिलीप जी ने मुझे लिखित में एक प्रोपोसल देने का सुझाव दिया और कहा कि मैं इसे डॉ आर्य को सीधे भेज सकता हूँ. डॉ आर्य से मिलने के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि वो स्वामी जी के साथ हैं क्योंकि बहुत से लोग मिलने आये हुए हैं.

इस बैठक के बाद Action point मेरे पास था - मुझे लिखित में एक प्रोपोसल भेजना है, जिसके लिए मुझे कुछ समय लगेगा. मैंने हरिद्वार से लौट कर इस पर काम करने का निश्चय किया. इस पूरी यात्रा में कईं बातें सीखी -
(१) एक संगठन के नेतृत्व और उसके साधारण कार्यकर्ताओं के बीच में सीधा संवाद स्थापित होना बेहद जरूरी है.
(२) आन्दोलनों में कुछ योगदान देने के लिए अचानक सब छोड़ कर निकलने से पहले पत्र-व्यवहार व स्थानीय स्तर पर कुछ योगदान देना बहुत कामगार साबित होता है.
(c) अच्छे नेताओं को शांत, संयमित होना चाहिए और बडबोलेपन से बचना चाहिए.

19.4.11

झंझावत

दिमाग में काफी कुछ चल रहा है. जीवन को उपयोगी कैसे बनाया जाए? समय समय पर जीवन को दिशा देने की कोशिश की है - एक राह पकड़ कर चलने की, लेकिन हर बार कमजोर साबित हुआ हूँ. एक बार मन में आया भी कि शायद मैं कमजोर ही हूँ, और जीवन का सबसे अच्छा उपयोग यही है कि ईमानदारी से गृहस्थ पालन करता चलूँ. लेकिन उस से मन को थोड़े समय के लिए ही तसल्ली मिलती है.

इस जीवन में मेरी सबसे बड़ी पूँजी यही है कि मैं ईमानदारी से अपना समय बिता रहा हूँ. मैंने सब उतार चढाव में सत्य बोलना, और रिश्वत के बिना अपने काम ठीक तरीके से करना जारी रखा है. ट्रेन में TTE को और BSNL के लाइन मैन को पैसे नहीं देना, VIP कोटा से अपनी ट्रेन टिकेट को confirm नहीं करवाना - ऐसे कुछ काम तो अब आदत बन गए हैं.
फिर भी कुछ बातें उद्वेलित करती रहती हैं, जिन के लिए न तो कुछ करता हूँ और न ही करने की ख्वाहिश छोड़ पता हूँ:

1. बाबुओं और नेताओं द्वारा भ्रष्ट आचरण
2. अंग्रेजी को अन्य भाषाओं की तुलना में वरीयता
3. विनम्रता और निष्काम कर्म की कमी

जब से अनुपम जी ISKCON में व्यस्त हुए हैं, मेरे भीतर की भक्ति और समर्पण के भाव जाग रहे हैं. भक्तों का संग अच्छा लगता है और उनकी विनम्रता और प्रेम मुझे प्रेरणा दे रहा है. इसी प्रेरणा का परिणाम ये झंझावत है, जो मेरे दिल और दिमाग में चल रहा है.

उम्मीद करता हूँ की भक्तों का साथ मुझे दिशा भी दिखाएगा और एक राह पकड़ कर चलने का साहस भी देगा.

25.12.07

विष्णु की पढाई

दीवाली की छुट्टियों में जब मैं डेनमार्क से भारत आया तो दिल्ली में घर के निकट कोई अच्छा हिन्दी माध्यम का विद्यालय ढूँढा। मेरे आश्चर्य एवं दुःख की सीमा न थी जब मैंने पाया कि कोई ऐसा विद्यालय है ही नहीं। नॉएडा में एक विद्यालय ऐसा मिला, पर चूँकि उनकी बस घर के पास तक नहीं आती थी इसलिए वह भी उपयुक्त नहीं जान पड़ा। वसुंधरा एन्क्लेव में ममता पब्लिक स्कूल में विष्णु का दाखिला करवाया, जो अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देता है।

ममता पब्लिक स्कूल में जल्द ही विष्णु का मन लग गया और उसने हिन्दी, अंग्रेजी वर्णमाला सीख ली। सौ तक अंग्रेजी गिनती भी सीख ली। फरवरी २००७ में जब विष्णु को स्कूल जाते हुए मात्र चार महीने हुए थे तो स्कूल के वार्षिक उत्सव में विष्णु ने सामुहिक नृत्य के कार्यक्रम में हिस्सा लिया। हम देखने गए और विष्णु का नृत्य देख कर बहुत खुश हुए। जो चीज खली वो थी बोलीवुड का बोल-बाला। छोटे छोटे बच्चे बोलीवुड के "कजरारे नैना" और "It's the time to disco" आदि पर नाच रहे थे। मेरे विचार से संस्कारित गीत एवं अन्य कार्यक्रम होने चाहियें और यह बात मैंने स्कूल की प्रधानाचार्या श्रीमती ममता वालिया के सामने रखी। प्रधानाचार्या ने मेरी बात सूनी और अपनी बेबसी कुछ इस प्रकार से दिखाई - "आज कल बच्चों को यही अच्छा लगता है, हम क्या करें।" मैं दुखी मन से घर लौटा।

अप्रैल २००७ में विष्णु का दाखिला नॉएडा के सरस्वती शिशु मंदिर में कराया। इस स्कूल की बस हमारे घर के नजदीक नहीं आती थी इसलिए सुबह ऑफिस जाने से पहले मैं विष्णु को स्कूल छोड़ने जाने लगा। दोपहर को विष्णु को लाने की जिम्मेवारी मेरी पत्नी आभा ने संभाल ली। गर्मी के दिनों में एक वर्ष की बेटी को घर पर आया के पास छोड़ कर आभा विष्णु को लेने जाती थी। इस छोटे से कष्ट के सामने बड़ी ख़ुशी हमारे सामने ये थी कि विष्णु को अच्छे संस्कार मिलने लगे। स्कूल पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का असर होने के कारण विष्णु को अनुशासन और बड़ों का सम्मान करना आदि गुण मिलने लगे। लेकिन हमें हैरानी तब हुई जब हम ने देखा की हिन्दी माध्यम विद्यालय में गणित अंग्रेजी भाषा में पढाया जाता है। अंग्रेजी गिनती और अंग्रेजी पहाडे देख कर मेरा माथा ठनक गया, पर अब कुछ कर नहीं सकता था। विष्णु सात महीने उस स्कूल में रहा और उस ने हिन्दी वाक्य पढ़ना / लिखना, अंग्रेजी के कुछ शब्द और गणित में ४ तक पहाडे सीख लिए.

फिर मैं परिवार सहित यहाँ इंग्लैंड आ गया हूँ। विष्णु यहाँ अंग्रेजी माध्यम के एक स्कूल में जा रहा है। उसकी आयु के बच्चे अभी अंग्रेजी वर्णमाला और २० तक गिनती सीख रहे हैं। विष्णु उनकी तुलना में काफी आगे है, पर अंग्रेजी बोलना उस ने अभी सीखना शुरू किया है.

16.12.07

ब्लागिंग फिर शुरु

एक साल से ज्यादा हो गया, ब्लाग पर कुछ लिखा ही नहीं। दिसम्बर २००६ में दो वर्ष डेनमार्क रहने के बाद भारत लौट गया। दिल्ली में गृहस्थी फिर से शुरु की, पु‌त्र विष्णु की पढ़ाई और अपने हिन्दी माध्यम में इन्जीनियरिंग कॉलेज शुरू करने के प्रयासों में वयस्त हो गया। जो थोड़ा समय मिलता, वह मित्रों व रिश्तेदारों से मिलने में निकल जाता। ब्लाग पर लिखना बन्द हो गया।

लगभग एक वर्ष बाद अब मैं ब्रिटिश टेलीकाम (British Telecom) के एक प्रोजेक्ट पर इपस्विच (Ipswich) इंगलैण्ड आ गया। अब जब कि मैं यहां settle हो गया हूं तो लगता है कि पुनः ब्लाग पर लिखना शुरू कर सकता हूं।

पिछले एक वर्ष में काफी कुछ घटित हुआ, जिसके बारे में लिखना चाहता हूं। विष्णु की तथाकथित हिन्दी माध्यम स्कूल में पढ़ाई, अपने इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करने के प्रयास और निराशा व निरुत्साह के दौर के बारे में शीघ्र ही लिखूंगा।

4.11.06

मेरा पीड़ादायक अनुभव

दिल्ली से डेनमार्क लौट आया हूं। अपने पुत्र विष्णु को पूर्वी दिल्ली के किसी अच्छे हिन्दी माध्यम विद्यालय में दाखिल करवाने का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाया। अपने घर के नजदीक वसुन्धरा एन्कलेव इलाके के सब विद्यालयों में घूमा, पर मुझे एक भी हिन्दी माध्यम विद्यालय नहीं मिला। सभी अंग्रेजी माध्यम में ही शिक्षा दे रहे हैं। नोएडा में प्रयास किया तो सैक्टर 12 में विद्या भारती द्वारा संचालित एक हिन्दी माध्यम विद्यालय मिला, लेकिन उसकी बस वसुन्धरा एन्कलेव में नहीं आती। मेरी पत्नी, जिसे दिल्ली में मेरी अनुपस्थिति में 2 महीने बिताने हैं, को हर रोज विष्णु को छोड़ने जाना बहुत असुविधाजनक हो जाता। इसलिए मन मार कर विष्णु को घर के नजदीक वसुन्धरा एन्कलेव में ही एक अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में दाखिला करवा दिया। विष्णु को होने वाली दिक्कतों का हमें भली भान्ति अन्दाजा है क्योंकि आज की तारीख में विष्णु को A, B, C, D के अतिरिक्त बिल्कुल अंग्रेजी नहीं आती। गिनती भी उसे हिन्दी में ही आती है। परन्तु कोई अन्य हल नहीं दिखाई दिया जिससे विष्णु की शिक्षा तुरन्त शुरू हो सके।
अपनी पीड़ा को शब्दों में कैसे बयान करूं? दिल्ली की गर्मी में बच्चों को टाई लगाकर विद्यालय जाते हुए देखना अपने आप में एक श्राप है। उस पर अंग्रेजी माध्यम से मिलने वाली अधकचरी शिक्षा किसी भी प्रकार मुझे अपने पुत्र के बारे में निश्चिन्त नहीं कर पा रही है।
विष्णु को तो अगले साल हिन्दी माध्यम के विद्यालय में ही भेजूंगा। साथ ही मैंने निश्चय किया है कि
1. ज्यादा से ज्यादा लोगों को मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने के लाभों से परिचित करवाऊंगा।
2. स्वयं एक उत्तम हिन्दी माध्यम विद्यालय की स्थापना करके एक उदाहरण प्रस्तुत करूंगा।

21.7.06

मेरी तीर्थ यात्रा (जून 2001)

वाराणसी और इलाहाबाद में भयभीत हिन्दुओं के दर्शन का मौका मिला। ये हिन्दू सब से डर रहे थे – मन्दिरों के पास दुकानदारों से‚ रिक्शा वालों से‚ पुरोहितों व पण्डों से – सबसे। ऐसे में वो क्या भक्ति करेंगे‚ क्या धर्म पर चलेंगे और क्या मुक्ति पाएंगे? वैसे मुझे लगता है कि उनके लिए मुक्ति के लिए भगवान और भगवान के व्यापारियों की चापलूसी – बस यही रास्ता है।
मन्दिर में दर्शन जल्दी से हो जाएं – इसका प्रयास सभी कर रहे थे। काशी विश्वनाथ मन्दिर में पंक्ति में लगने के झंझट को छोड़ कर आगे निकल जाने की प्रवृत्ति दिखाई दी। कोलकता कालीघाट पर जैसे ही हमने मंदिर की गली में प्रवेश किया‚ जल्दी दर्शन करवाने वाले “ब्राह्मन” ने हमें पकड़ लिया।
इलाहाबाद के पातालपुरी मंदिर में द्वार पर एक व्यक्ति बैठा था जो हर दर्शनार्थी से एक–एक रूपया वसूल कर रहा था। वहां कहीं भी न तो “दर्शन की टिकट” सम्बन्धी कुछ लिखा था और न ही वह कोई रसीद दे रहा था। आश्चर्य की बात थी कि वही व्यक्ति धौंस दिखा रहा था जबकि हिन्दू भक्त उस से दबी जबान में बात कर रहे थे। मैं द्वार पर खड़ा उस व्यक्ति को घूरता रहा और सोचता रहा कि पुलिस को बुलाऊं या न बुलाऊं। यह भय भी था कि कहीं ये भाग ना जाए और यह भय भी था कि सब मिले हुए होंगे। खैर मुझे कोई पुलिस वाला दिखाई नहीं दिया। उस व्यक्ति को मुझ से भय हुआ या उस ने ऐसे ही कहा कि आप दर्शन कर लीजिए। मैंने कहा कि मैं एक पैसा भी नहीं दूंगा और उसने कहा कि कोई बात नहीं। उस ने कहा कि ये पैसा मन्दिर की देख रेख में ही खर्च होगा। जब मैंने कहा कि फिर ये पैसे दान पेटी में डालो तो उस ने तपाक से कहा कि वो सब पैसा तो पण्डित लोग खा जाएंगे। यह तो राम जाने कि अन्दर अन्दर क्या होता है पर बदबू तो असहनीय सी लगी।
ऐसे ही संगम पर विचित्र दृश्य देखा। जैसे ही हमारी नाव संगम पहुंची‚ हमारे नाविक ने कहा कि गंगा मैया को लात मारने (नहाने के लिए उतरने को उस ने लात मारना कहा) से पहले नारियल और फूल चढ़ाओ। उसने कहा कि दस रूपए का नारियल साथ वाली नाव से ले सकते हो। एक बारगी मुझे आश्चर्य हुआ कि संगम के बीच में आकर वो नारियल चढ़ाने को कहता है और नारियल की मात्र एक दुकान – तो भी सिर्फ दस रूपए का नारियल बिकता है। खैर मैंने कहा कि मैं तो ऐसे ही नहाऊंगा‚ मुझे नारियल नहीं चढ़ाना। इस पर नाव के सहयात्री और नाविक मुझ पर खूब बिगड़े – जैसे कि अगर मैं ऐसे ही नहा लिया तो घोर नरक में सड़ना पड़ेगा। कुछ उनकी श्रद्धा का असर और कुछ खुद को कंजूस समझने का भाव – मैंने नारियल खरीदने का निश्चय किया। नारियल बेचने वाले “पण्डित” ने नारियल हाथ में रखा और मन्त्र पढ़ने शुरू किए। कुछ मन्त्र मुझ से भी बुलवाए। 2–3 मिनट बाद उसने पूछा कि कितनी दक्षिणा दोगे‚ और मैंने तुरन्त जवाब दिया – “एक पैसा भी नहीं”। उसने मुझे दुत्कारा‚ उठ कर जाने को कहा‚ शेष मन्त्र नहीं पढ़े। मैंने वह नारियल संगम में बहाया और “पण्डित” के साथी तुरन्त ही वह नारियल तैर कर निकाल लाए और बिकाऊ नारियलों के साथ रख दिया। मुझे उन दुष्टों को दस रूपए देने का दु:ख हुआ। यह देख कर भी दु:ख हुआ कि पण्डित के सामने बैठे भक्त जन मुझे दुत्कारा जाता देख कर भी चुप रहे और उन्होंने उस पण्डित से “डरते–डरते” सब कर्म–काण्ड करवाए। मेरे सहयात्री‚ जो मुझे नारियल लेने को समझा रहे थे‚ आपस में बात कर रहे थे कि राजा भगीरथ तपस्या करके गंगा को कलकत्ता से लाए थे।
हर मन्दिर में भयभीत हिन्दू ही दिखाई दिए। मन्दिरों की दीवारों को छूते‚ मूर्ति को छूते‚ शिवलिंग से लिपटते‚ पण्डितों की एक हुंकार से रूकते और चलते‚ हमेशा यही निश्चय करने में लगे रहते कि किस मूर्ति पर नमस्कार कर दिया है और किस पर अभी करना है।
पातालपुरी के सामने फुटकर सिक्कों की दुकानें भी जमी हुई थी। एक रूपए के सिक्के के बदले में 9 दस्सियां बेच रहे थे। मन्दिर के सामने इस प्रकार का व्यापार इसलिए हो रहा था ताकि हिन्दू भक्त मानसिक रूप से सन्तुष्ट रहे कि उन्होंने 9 मूर्तियों को धन चढ़ाया‚ ना कि सिर्फ एक मूर्ति को। उन मूर्खों को यह हिसाब समझ में नहीं आता कि पहले वो मन्दिर को एक रूपया दान दे सकते थे‚ पर अब सिर्फ 90 पैसे ही दान कर रहे हैं।
एक और वृत्ति यह देखी कि लोग मूर्ति पर पैसा फैंक रहे हैं। यह प्रवृत्ति बचपन से देख रहा हूं। इसी प्रवृत्ति के कारण पुजारी लोग मन्दिर का पैसा आसानी से अपनी जेब में पहुंचा पाते हैं। काशी विश्वनाथ मन्दिर में किसी ने जल्दी दर्शन करवाने के लिए मुझ से धन नहीं मांगा। शायद भीड़ ना होने के कारण ऐसा हो‚ वर्ना मैंने तो सुना है कि वहां पैसा देकर जल्दी दर्शन किए जा सकते हैं। गन्दगी बहुत थी। टूटे हुए कसोरे का एक टुकड़ा मेरे पैर में चुभ भी गया था और मुझे खून बहने जैसा लगा था‚ पर खून आया नहीं था।
कुछ मन्दिरों में पैसा देने की इच्छा थी‚ पर नहीं दे पाया। एक तो माहौल ही व्यापार–बाजार जैसा था तो मन नहीं किया‚ दूसरे कहीं भी भक्ति भाव नहीं जगा। सर्वत्र भय व लूट का साम्राज्य था।
भारद्वाज मुनि के आश्रम में भी सब की नजरें इसी पर लगी थी कि मैं क्या चढ़ाता हूं। मुझे बुला–बुला कर औरतें ले गई और कहा कि माता अनुसुइया के सामने अवश्य कुछ चढ़ाओ‚ भारद्वाज मुनि के चरण अवश्य छुओ। पर मैंने उनकी एक न मानी। इससे उन्हें क्रोध आया और उन्होंने द्वार ऐसे बन्द किया जैसे फिर कभी पांव न धरने देंगी।
वाराणसी के कुछ मन्दिरों (दुर्गा मन्दिर और विश्वनाथ जी का मन्दिर) में लिखा था कि सिर्फ हिन्दू रिलीजन के लोग ही मन्दिर में जा सकते हैं। यह मुझे हल्कापन लगा। गम्भीरता से देखें तो हिन्दू की परिभाषा में वो लोग भी नहीं आएंगे जो वहां पुजारी बन कर बैठे हैं। और मात्र हिन्दू पूर्वजों की सन्तान होने से अगर कोई हिन्दू हो जाता है तो भी सबको मन्दिर में प्रवेश का अधिकार मिलना चाहिए। इस दृष्टि से इसाईयों की स्थिति बेहतर है जो चर्च में यह तख्ती नहीं लगाते कि मात्र इसाई ही चर्च में प्रवेश कर सकते हैं।
मुझे कहीं भी ‘शूद्रों का प्रवेश वर्जित है’ का अनुभव नहीं हुआ। यह प्रथा शायद अब उतनी नहीं है। कम से कम मुझे न तो ऐसा दिखाई दिया और न ही मुझ से किसी ने कुछ पूछा।
भक्ति के विचार से दक्षिणेश्वर ही ठीक रहा। शेष सब जगह अच्छा अनुभव नहीं रहा। वैसे संगम में नहाते हुए और मानस मन्दिर (वाराणसी) में भी अच्छे भाव मन में उठे थे।