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17.6.11

मेरी हरिद्वार यात्रा

रविवार (१२ जून) को जब मैंने पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार में प्रवेश किया तो मन में स्वामी रामदेव के स्वास्थ्य को लेकर चिंता तो थी, पर साथ ही यह कामना भी थी की रामदेव जी (एक संन्यासी) ने इस अनशन को "आमरण अनशन" कहा है तो इस अनशन को तब तक समाप्त नहीं करना चाहिए जब तक सब मांगे मान नहीं ली जाती. इन दो विरोधाभासी विचारों के बीच ही मन कह रहा था कि बाबा रामदेव आज अनशन तोड़ देंगे, जिसका भरोसा श्री श्री रविशंकर एक दिन पहले जता चुके थे.

मेरे लिए हरिद्वार जाना एक महत्त्वपूर्ण निर्णय था. TCS में अपने काम को छोड़ कर निकलना मेरे बॉस राजेश ने कुछ आसान बना दिया, क्योंकि राजेश स्वयं एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं तथा दुनिया में चल रहे विभिन्न आन्दोलनों के प्रति अपना वैयक्तिक मत रखते हैं. मैंने जब हरिद्वार जाने का फैसला किया तो मुझे नहीं मालूम था कि यह आन्दोलन कितना लम्बा चलेगा, परन्तु मेरा निश्चय था कि विजय मिलने से पहले लौटूंगा नहीं. मेरी पत्नी आभा मेरे लम्बे समय तक आन्दोलन से जुड़ने के पक्ष में नहीं थी और मेरे पिताजी तो एक दिन के लिए भी जुड़ना परिवार व TCS के प्रति गैरजिम्मेदारी व बेवकूफी भरा निर्णय बता रहे थे. खैर, मैं पतंजलि योगपीठ पहुँच चुका था और उम्मीद कर रहा था कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध यह आन्दोलन भारत के लिए एक एतिहासिक क्षण ला पायेगा.

योगपीठ में यज्ञशाला नामक स्थान पर आन्दोलनकारियों व मीडियाकर्मियों के बैठने की व्यवस्था की गयी थी. कुल ५०-६० लोग रहे होंगे, जो टीवी के माध्यम से आन्दोलन की खबरें पा रहे थे. मेरे ख्याल से आन्दोलन के नेताओं को आन्दोलनकारियों से सीधा संवाद स्थापित करना चाहिए था. अनशन टूटने की खबर भी वहां टीवी के माध्यम से ही पहुंची, जो कि मेरी हरिद्वार यात्रा की पहली बड़ी निराशा थी. अनशन टूटना स्वयं एक बढ़ी निराशा थी ही.

खैर मुझे कुल मिला कर अपना हरिद्वार आना व्यर्थ लगा क्योंकि मैं समझ चुका था कि यह आन्दोलन अब कुछ समय के लिए तो अपनी ऊर्जा खो ही देगा. तभी मैंने अपने बॉस राजेश को इस आशय का सन्देश भेजा कि मेरी वापसी जल्द ही होगी. दोपहर के भोजन के बाद मैंने कईं कार्यकर्ताओं से बात कि और दो प्रश्न पूछे - (१) अनशन टूटने के बाद अब इस सत्याग्रह का अगला कदम क्या होगा?, (२) मैं आन्दोलन में योगदान देना चाहता हूँ, इसलिए मुझे स्वयंसेवकों के दल में शामिल होने के लिए क्या करना होगा? स्वयंसेवक के तौर पर मैंने सफाई से लेकर कंप्यूटर के किसी काम को करने के लिए अपनी तैयारी दिखाई. दोनों में से किसी भी प्रश्न का जवाब संतोषजनक नहीं मिला. मुझे आचार्य जी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के लौटने तक इंतज़ार करने कि सलाह दी गयी और खाली बैठने को कहा. शाम को आखिरकार अपने प्रयास में मुझे थोड़ी सफलता मिली जब मुझे यज्ञशाला के निकट कुर्सियां तरतीब से लगाने का काम दिया गया.

किसी को मालूम नहीं था कि स्वामी जी कब लौटेंगे, पर सब इंतज़ार कर रहे थे. योगपीठ के अन्य सब काम तथा आयुर्वेदिक अस्पताल अपना नियमित काम कर ही रहे थे. सोमवार का सारा समय इस इंतज़ार में बीता कि शायद स्वामी जी आ ही जाएँ. स्टार न्यूज़ के एक व्यक्ति से बात करके पता चला कि स्वामी जी के अगले दिन सुबह ही आने कि संभावना है. स्वयंसेवा के लिए कोई मौका न देख कर मैंने पुस्तकालय में २ घंटे बिताये. योगपीठ का पुस्तकालय काफी समृद्ध है और विशेषतः हिंदी भाषा की पुस्तकों की अच्छी collection है. उन पुस्तकों को देख कर अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गौरव का एहसास हुआ तथा मन किया की वहां बैठ कर गंभीर अध्ययन करूं. लेकिन मैं जानता था कि अध्ययन का मौका अभी नहीं है.

शाम को मुझे योगपीठ के फेस २ में राजीव भवन जाकर विनोद जी से मिलने को कहा गया. विनोद जी शायद सूचना तकनीकी के लिए वहां कुछ setup कर रहे हैं और मेरी पृष्ठभूमि को देखते हुए शायद यह सोचा गया होगा कि मैं वहां कुछ स्वयंसेवा कर सकूंगा. मैं तुरंत राजीव भवन पहुंचा, जो कि भारत स्वाभिमान के श्री राजीव दीक्षित कि पावन स्मृति में बनाया गया है. ये वही राजीव दीक्षित हैं, जिनके भाषणों को सुनने के लिए १९९८-९९ में हम मुंबई में घूमते थे और जिनकी राष्ट्रनिष्ठा और देशभक्ति से प्रेरणा पाते थे. विनोद जी से जब मैं मिला तो मैंने पाया कि उनके पास मुझे देने को कोई काम नहीं है. शाम का समय था, इसलिए उन्होंने कहा कि अगले दिन सुबह वो मुझे कुछ बता सकेंगे. मैंने कहा कि मैं रात को भी जो काम बोलेंगे, वो करने को तैयार हूँ, पर विनोद जी ने कहा कि अभी वो एक आवश्यक बैठक के लिए निकल रहे हैं, इसलिए सुबह ही बता पायेंगे. मैंने उनसे एक प्रार्थना और की कि भारत स्वाभिमान "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के मुद्दे पर जो कुछ काम कर रही है, मुझे उसकी जानकारी चाहिए. विनोद जी ने अगले दिन सुबह ९ बजे से पहले मुझे फोन पर बात करके दिशा दिखाने का भरोसा जताया और मेरा फोन नंबर ले लिया.

अगले दिन सुबह मुझे कोई फोन नहीं आया. पता लगा कि स्वामी जी हरिद्वार लौट आये हैं और ११:३० बजे के करीब दर्शन देंगे. मैं तुरंत यज्ञशाला पहुंचा कि शायद सत्याग्रह की भावी दिशा का पता लग सकेगा. वहां उस समय लगभग ४००-५०० लोग थे, तभी सूचना जारी हुई कि स्वामी जी अस्पताल के OPD हॉल में दर्शन देंगे. सुब लोग यज्ञशाला से निकल कर OPD हॉल में पहुंचे; मैं भी पहुंचा. इस पूरे समय में मैंने देखा कि यज्ञशाला के आसपास का जो तामझाम (टेंट, कुर्सियां, इत्यादि) था, उसे उठवाया जा रहा है. बाबा रामदेव कि प्रतीक्षा में हम बैठे थे, जब मंच से किसी ने घोषणा की कि सत्याग्रह जारी रहेगा और सब लोग अपने-अपने जिलों में लौट कर वहीँ से सत्याग्रह में भाग लें.

कोई १ घंटे की प्रतीक्षा के बाद स्वामी रामदेव पहुंचे. मैंने पहली बार उन्हें प्रत्यक्ष देखा था. शरीर से कमजोर, लेकिन चुस्त. चेहरे पर शांति व सौम्यता विराजमान थी. मंच पर पहुँच कर उन्होंने कुछ वरिष्ठ संतों के चरण छुए. कुछ अन्य संतों ने स्वामी जी के चरण छुए. स्वामी जी पर पुष्पवर्षा की गयी, और कार्यकर्ताओं ने "भारत माता की जय" और "वन्दे मातरम्" के नारों से माहौल गुंजा दिया. बिना कोई शब्द बोले स्वामी जी मंच से चले गए.

मुझे अभी भी सत्याग्रह की भावी दिशा का पता नहीं चला था. मैं वहां पहुंचा जहां से मीडिया के लोग रिपोर्ट कर रहे थे. कुछ लोगों में कैमरे के सामने खड़े होने की लालसा देखी, पर मैं दूर खड़ा हो कर सुनने की कोशिश कर रहा था कि क्या बताया जा रहा है. पता लगा कि सत्याग्रह को लेकर भ्रम की स्थिति है और ऐसी अफवाहें उड़ रही हैं कि स्वामी जी ने ८-१० दिन का मौन धारण किया है. मेरी इच्छा थी कि मैं मीडिया से पूछूं कि वो इस आन्दोलन के मुद्दों पर चर्चा करने की बजाय इस पर ध्यान क्यों लगा रहे हैं कि बाबा के पीछे कौन है, पर मैं अपने स्वयं के संकोच के कारण यह पूछ न पाया.

वहां से निपटने के बाद लगभग २ बजे मुझे एक ब्रह्मचारी मिले, जिन्होंने अपना जीवन बाबा की सेवा में समर्पित कर दिया है. उन्होंने बताया कि ऐसे लगभग १५० युवक-युवतियां हैं जिन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहते हुए भारत स्वाभिमान का काम करने की कसम खाई है. उन ब्रह्मचारी को जब मैंने बताया कि मुझे कुछ दिनों से सत्याग्रह की कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है, तो उन्होंने खेद प्रकट किया और कहा कि ऐसी व्यवस्था नहीं की जा सकी, जिस से मुझ जैसे लोगों को मार्गदर्शन दिया जा सके. "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के विषय में उनका कहना था कि सरकार को ही इस दिशा में पहल करनी होगी (जिस के बारे में मेरा मत कुछ भिन्न है). उन्होंने अपने एक सहयोगी को कहा कि मुझे स्वामी मुक्तानंद से मिलवा दे. उनके सहयोगी थोडा घबराये, जिस से मैंने अंदाजा लगाया कि स्वामी मुक्तानंद जी शायद काफी वरिष्ठ हैं. मैं उनके साथ स्वामी मुक्तानंद कि खोज में निकला. थोड़ी देर में भगवे वस्त्रों में एक स्वामी मिले, जो सब कार्यकर्ताओं को योगपीठ के फेस २ में जाने को कह रहे थे. बाद में पता चला कि वही स्वामी मुक्तानंद थे. मैं फटाफट से खाना खाकर फेस-२ में पहुंचा, इस उम्मीद में कि सब से वहीँ पर मुलाकात होगी. परन्तु दुर्भाग्य से मुझे फेस-२ में कोई नहीं दिखाई दिया. मैं राजीव भवन में जाकर बैठ गया तो वहीँ विनोद जी मिल गए. मैंने शालीनतावश उनसे सुबह ९ बजे फोन न करने का तकाजा नहीं किया, पर यह जरूर कहा कि "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के विषय पर स्पष्टता मिलने से पहले मैं वहां से नहीं लौटूंगा.

विनोद जी मुझे डॉ जयदीप आर्य के कार्यालय में ले गए. डॉ आर्य बाबा के बहुत नजदीकी सहयोगी हैं और मुझे विश्वास था कि वो मेरी सहायता अवश्य करेंगे. लेकिन उनके कार्यालय में एक अन्य सज्जन दिलीप जी बैठे थे, जो शायद कार्यालय को संभालने का काम करते हैं. वो स्वयं भी एक वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं. मैंने उनको अपनी सारी रामकहानी सुनायी, जो उन्होंने कुछ रूचि से व कुछ अरुचि से सुनी. उन्होंने भी यही कहा कि "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के लिए सरकार को ही पहल करनी होगी. उसके बिना वो चाह कर भी कुछ नहीं कर सकेंगे. मैंने कहा कि जनता एवं भारत स्वाभिमान जैसे संगठन भी काफी कुछ कर सकते हैं, इसलिए सरकार के कुछ करने कि "प्रतीक्षा" करना शायद ठीक नहीं होगा, जैसे (१) अंग्रेजी को दिए जाने वाले स्पेशल treatment की खबरों को जनता तक ले जाना, (२) हिंदी में नए शब्द रचना, (३) हिंदी माध्यम में इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करने की दिशा गंभीर पहल करना, ये कुछ काम तुरंत शुरू किये जा सकते हैं. दिलीप जी ने मुझे लिखित में एक प्रोपोसल देने का सुझाव दिया और कहा कि मैं इसे डॉ आर्य को सीधे भेज सकता हूँ. डॉ आर्य से मिलने के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि वो स्वामी जी के साथ हैं क्योंकि बहुत से लोग मिलने आये हुए हैं.

इस बैठक के बाद Action point मेरे पास था - मुझे लिखित में एक प्रोपोसल भेजना है, जिसके लिए मुझे कुछ समय लगेगा. मैंने हरिद्वार से लौट कर इस पर काम करने का निश्चय किया. इस पूरी यात्रा में कईं बातें सीखी -
(१) एक संगठन के नेतृत्व और उसके साधारण कार्यकर्ताओं के बीच में सीधा संवाद स्थापित होना बेहद जरूरी है.
(२) आन्दोलनों में कुछ योगदान देने के लिए अचानक सब छोड़ कर निकलने से पहले पत्र-व्यवहार व स्थानीय स्तर पर कुछ योगदान देना बहुत कामगार साबित होता है.
(c) अच्छे नेताओं को शांत, संयमित होना चाहिए और बडबोलेपन से बचना चाहिए.

21.9.08

दो राष्ट्र का सिद्धांत

चालीस के दशक की परिस्थितियाँ पुनः बन रही हैं। उस समय जिन्ना था, अब गिलानी वही बातें कर रहा है। हिंदू और मुसलमान दो विभिन्न राष्ट्र हैं और वो एक साथ मिल कर नहीं रह सकते - यही दो राष्ट्र का सिद्धांत है, जिस के आधार पर पाकिस्तान बना, लेकिन भारत ने इस सिद्धांत को कभी स्वीकार नहीं किया।

चालीस के दशक में सांप्रदायिक ताकतें अपने चरम पर थी। एक ओर मुस्लिम लीग भारत की अखंडता को तोड़ने के लिए हिंदू व मुस्लिम समुदायों का ध्रुवीकरण करने में लगी थी, वहीं हिंदूवादी संगठन देश की अखंडता बचाने के लिए मुस्लिम लीग की हिंसा में भागीदारी कर रहे थे। दोनों समुदाय धीरे-धीरे एक दूसरे का विश्वास खोते गए और अंततः पाकिस्तान बन ही गया। आज भी पाकिस्तान यह बात मानता है की हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते, जबकि भारत इसके उलट "हिंदू मुस्लिम सिख इसाई, आपस में सब भाई-भाई" का नारा बुलंद करता रहा है।

१९४७ के बाद भारत में हिंदू-मुस्लिम सौहार्द फ़िर से स्थापित हुआ। शिक्षा पाठ्यक्रम, राजनैतिक नेता, धर्मगुरु और सामान्य जन - सभी स्तरों पर पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत को बल मिला। कुछ साम्प्रदायिक दंगों की बात छोड़ दें तो अधिकाँश समय शांतिपूर्वक ही बीता।

लेकिन १९८० के दशक में जम्मू कश्मीर के चुनावों में कथित धांधली के बाद कश्मीर में अलगाववाद का दौर शुरू हो गया। जम्मू कश्मीर में धारा ३७० के कारण ऑटोनोमी शुरू से रही है। वहाँ मुख्यमंत्री सदा मुसलमान रहे हैं, कश्मीरी लोग भारत में प्रधान मंत्री, गृह मंत्री व सेना प्रमुख भी रहे हैं - लेकिन फ़िर भी अलगाववाद यह बोल कर शुरू हुआ की भारत ने कश्मीरियों के साथ भेद-भाव किया है। झूठ के पाँव नहीं होते, लेकिन एक झूठ बार-बार बोला गया तो लोगों ने उसे ही सच मानना शुरू कर दिया। अस्सी के दशक का अलगाव नब्बे के दशक में कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीर से निकालने में कामयाब हो गया। "दो राष्ट्र के सिद्धांत" को पाकिस्तान की शह पर फ़िर से बल मिल रहा था। लेकिन भारत ने हार नहीं मानी थी।

भारत ने अलगाववादियों की बन्दूक का सामना करने के लिए सेना भेजने का फ़ैसला किया। भारतीय सेना ने आम कश्मीरियों के जान माल की रक्षा करने के लिए अलगाववादियों को खदेड़ना शुरू किया। लेकिन इस्लाम के नाम पर इसका विरोध किया गया और इल्जाम लगाया गया की भारतीय सेना कश्मीरियों पर जुल्म कर रही है। अब तर्क १८० डिग्री घूम कर कुतर्क बन गया और यह कहा जाने लगा कि क्योंकि भारतीय सेना कश्मीर में है, इसीलिए कश्मीरी आतंकवादी बन रहे हैं। आज तो चालीस के दशक की ही तरह भारत में फ़िर से एक वर्ग ऐसा बन गया है, जो कश्मीरी अलगाववादियों के भारत से अलग होने के अधिकार को मान्यता दे रहा है।

"दो राष्ट्र का सिद्धांत" हमने न कभी स्वीकार किया है, न कभी करेंगे। बराबर के अधिकार और बराबर की आजादी के साथ सब मतों के लोग भारत में सदियों से मिलजुल कर रहते हैं। ये कश्मीरी अलगाववादी भी चाहें तो मिल कर रह सकते हैं, लेकिन इस्लाम का वास्ता देकर किसी प्रकार उनके दिमाग में बैठ गया है की हिंदू जनों के साथ वो नहीं रह सकते। जो लोग ये नहीं मानना नहीं चाहते की कश्मीर की लड़ाई इस्लाम को लेकर है तो वो कृपया गिलानी का भाषण सुन लें। गिलानी ने यह भाषण श्रीनगर में हजारों लोगों के सामने दिया था; मीरवायज उमर फारूक और यासीन मलिक भी वहीं थे, पर किसी ने प्रतिवाद नहीं किया! उस भाषण के बाद भी यदि किसी को संदेह बचे तो उसकी बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है।

इस लेख के माध्यम से एक ही बात कहना चाहता हूँ की मर जाएंगे, मिट जाएंगे, पर इस बार देश का विभाजन नहीं होने देंगे। जो मिल जुल कर नहीं रह सकता, वो देश छोड़ कर जाने के लिए स्वतंत्र है। कश्मीर का सवाल सिर्फ़ जम्मू और कश्मीर राज्य या भारत-पाकिस्तान का सवाल नहीं है, बल्कि मानवीय मूल्यों का सवाल है। इस बार हम हारे तो बेहतर होगा की भारत के इतने टुकड़े हो जाएँ जितने भारत में पंथ हैं। कम से कम १०-१२ टुकड़े होने चाहियें, लेकिन वो दिन देखने से पहले मैं अपना बलिदान दे दूँगा।

12.8.08

शेख अजीज की मृत्यु के जिम्मेदार

आज से पहले मैंने शेख अजीज का नाम भी नहीं सुना था। कश्मीर के बड़े अलगाववादी नेताओं का जिक्र आता है तो यासीन मालिक, गिलानी और मीरवायज आदि का ही नाम सामने आता है। शेख अजीज के बारे में कश्मीर के बाहर के लोग कम ही जानते हैं। वो हुर्रियत के एक वरिष्ठ नेता थे और हुर्रियत Executive Council में शामिल थे। आज पुलिस की गोली से वो घायल हो गए और श्रीनगर के एक हस्पताल में उनका निधन हो गया।

शेख अजीज भारत माता के सपूत शायद न कहे जा सकते हों। वो मुख्यधारा से अलग एक राजनैतिक दल में थे और कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग स्वीकार नहीं करते थे। अमरनाथ यात्रियों के लिए बेहतर इंतजाम करने के लिए जमीन देने से उनके अभिमान को ठेस लगी थी और उन्होंने इसका विरोध किया था। उनका तर्क था कि अमरनाथ यात्रियों को पहले से ही कश्मीरियों का सहयोग मिलता रहा है और भविष्य में भी यात्रियों को इस सहयोग के अतिरिक्त कुछ देने की आवश्यकता नहीं है। अभी कुछ साल पहले ही बर्फ के तूफ़ान से सैकडों यात्री हताहत हुए थे, उसकी याद हम भारतीयों को ही नहीं है तो इन अलगाववादी नेताओं से क्या उम्मीद करें? शेख अजीज ने कभी अमरनाथ यात्रा तो की नहीं, इसलिए उनको यात्रियों के कष्ट का अंदाजा नहीं लग पाया और बेहतर सुविधाओं का विरोध कर बैठे।

खैर, शेख अजीज आज नहीं रहे। उनको पुलिस की गोली तब लगी जब वो अपने समर्थकों के साथ मुजफ्फराबाद जा रहे थे। ये वही मुजफ्फराबाद है, जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की राजधानी है। मुझे लगता है कि मुजफ्फराबाद को भारत अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है, इसलिए शेख अजीज को भारत के ही किसी दूसरे हिस्से में जाने पर पुलिस को गोली चलाने की जरूरत नहीं थी। पर क्योंकि पाकिस्तान ने पिछले छ: दशक से मुजफ्फराबाद समेत हजारों वर्गमील जमीन पर कब्जा जमाया हुआ है, इसलिए शायद भारत सरकार को ऐसा लगा कि शेख अजीज वस्तुत: पाकिस्तान ही जा रहे हैं। ये भी हो सकता है की शेख अजीज कश्मीर के तथाकथित "आर्थिक बहिष्कार" के विरोध में मुजफ्फराबाद जा रहे थे, इसलिए सरकार उसे रोकना चाह रही हो। दो भाइयों के बीच मनमुटाव हो और एक भाई यदि दुश्मन के घर जाने लगेगा तो उसे कोई समझदार आदमी रोकेगा ही। भारत सरकार ने उन्हें समझाया, अपीलें की, यकीन दिलाया कि कोई "आर्थिक बहिष्कार" नहीं है, पर अपने मद में चूर हुर्रियत के नेताओं को लगा कि कश्मीरियों की भावनाओं को भड़काने और इसका राजनैतिक लाभ उठाने का इस से अच्छा मौका नहीं मिलेगा। वो मुजफ्फराबाद जाने की जिद में आगे बढे, पुलिस ने रोका पर जब हिंसा शुरू हो गयी तो पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। शेख अजीज की दुखद मृत्यु इसी का परिणाम है।

मुझे मालूम है कि कश्मीर में जनता को तस्वीर का एक ही पहलू दिखाया जाएगा - "भारत की सेना और पुलिस की बर्बरता का एक और नमूना"। शेख अजीज अपने और हुर्रियत के दुराग्रह का शिकार हुए, ये सच बोलने की हिम्मत कश्मीर में किसी को नहीं है। एक जिम्मेदार और सत्यनिष्ठ व्यक्ति न तो अमरनाथ यात्रियों को अतिरिक्त सुविधाओं का विरोध करेगा और न ही घरेलू झगडों को लेकर दुश्मन से हाथ मिलाएगा, लेकिन हुर्रियत में न तो कोई जिम्मेदार नेता है और न ही सत्यनिष्ठ।

सच यही है कि अमरनाथ और आर्थिक बहिष्कार को लेकर किए गए इस झूठे प्रचार की जिम्मेदार बन्दूक संस्कृति है जिस वजह से घाटी में सच बोलने की हिम्मत कोई नहीं करता। शेख अजीज की मृत्यु का जिम्मेदार हुर्रियत का झूठा प्रचार और उनका दुराग्रह ही है।

14.8.06

राष्ट्रपति जी द्वारा सात सूत्रीय शपथ

60वें स्वाधीनता दिवस के उपलक्ष्य में हमारे राष्ट्रपति जी ने युवाओं को सात सूत्रीय शपथ लेने का आह्वान किया है। ये शपथ है :

मैंने तो यह शपथ ले ली है। सब युवाओं से अनुरोध है कि दृढ़तापूर्वक यह शपथ लेकर राष्ट्र एवं जगत को खुशहाल बनाने की ओर अग्रसर हों।

राष्ट्रपति जी से विनम्र अनुरोध है कि वो देश के नेताओं को भी यह शपथ लेने को प्रेरित करें। कितना अच्छा हो कि आफिस आफ प्रोफिट बिल और सूचना के अधिकार वाले बिल जैसी हठधर्मिता छोड़ कर राष्ट्र निर्माण का काम करें। दोनों बिल चौथी एवं पांचवीं शपथ का उल्लंघन प्रतीत होते हैं।

27.7.06

कारगिल में आक्रमण पाकिस्तानी सेना ने किया था?

मोहम्मद नासिर अख्तर कोई छोटी मोटी शिख्सयत नहीं है। पाकिस्तानी सेना के कईं उच्च पदों को नवाजा है और आजकल भारत में अपने भूतपूर्व वायुसेनाध्यक्ष के साथ पधारे हुए हैं।

रीडिफ में छपे एक साक्षात्कार में उनके मुंह से निकल ही गया कि कारगिल पर उन्होंने आक्रमण इसलिये किया था ताकि भारत को शान्ति वार्ता के लिए मजबूर कर सकें। मुंह से निकल तो गया पर अब इसे सही भी करना था तो आखिर में यह वाक्य भी जोड़ गए कि आक्रमण मुजाहिदों ने किया था। खैर, वो कारगिल को अपना सफल अभियान मानते हैं।

मुझे अच्छे से याद है कि भारतीय सेना (जिसे अख्तर साहब हिन्दू सेना कह रहे हैं) कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों के शव पाकिस्तानियों को सौंप रही थी और उन्होंने ये शव लेने से मना कर दिया था। उसके बाद भारत की ”हिन्दू” सेना ने ही इस मुस्लिम सेना के सैनिकों का इस्लामिक रीति से अन्तिम संस्कार किया था। परन्तु अब समझ में मुझे यह नहीं आ रहा है कि क्या कोई सेना युद्ध में मारे गए अपने ही सैनिकों के शव लेने से मना कर देगी? सिर्फ इसलिए कि आक्रमण का इल्जाम उनके ऊपर ना आ जाए।

20.7.06

भारत: मोक्ष का द्वार?

भारत भूमि को मोक्ष का द्वार व जगतगुरू कहा जाता रहा है। क्या हमारे पूर्वज उन राष्ट्रवादियों जैसे थे जो स्वप्रशंसा और दूसरों को दोयम समझने में विश्वास रखते हों ? ऐसा नहीं था। वें तो वसुधैव कुटुम्बकम् कहने वाले और ईश्वर को सर्वत्र मानने वाले थे। प्रश्न उठता है कि उन्होंने भारत ही को मोक्ष का द्वार क्यों कहा।
मोक्ष या मुक्ति के लिए व्यक्ति को माया का आवरण हटा कर सोहम् से साक्षात्कार होना चाहिए। उसके लिए क्रोध‚ दर्प‚ अज्ञान को छोड़ते हुए निर्भयता‚ सत्य‚ अहिंसा‚ तप‚ स्वाध्याय‚ दया‚ धैर्य‚ नम्रता जैसे दैवी गुणों को धारण करना चाहिए। भारतीय समाज में प्राचीन समय से ही इन दैवी गुणों के विकास के लिए उपयुक्त माहौल रहा करता था। इसी कारण से भारत को जगतगुरू व मोक्ष का द्वार भी कहा जाता था। सैकड़ों वर्षों की दासता के परिणामस्वरूप हम भारतीयों ने अपना आत्म–सम्मान ही नहीं खोया‚ आत्मविश्वास भी खो दिया है। पश्चिम की अन्धाधुन्ध नकल इसी का परिणाम है। पश्चिमी विचारधारा दुभार्ग्यवश भौतिकवाद को तो बढ़ावा देती है‚ परन्तु ऊपर वर्णित दैवी गुणों के विकास में तो वह बाधा ही है। ईसाई धर्मग्रन्थ बाइबल के अनुसार भी धनवान का ईश्वर के राज्य में प्रवेश सूई के छेद से ऊंट के गुजरने से भी कठिन है।
क्या आप भारत को पुन: मोक्ष का द्वार व जगतगुरू बनाना चाहोगे? यदि हां तो उसके लिए बातें बनाने से और अपने गौरवमय अतीत की डींगें हांकने से कुछ नहीं होगा। उसके लिए निश्चय पूर्वक कुछ कर दिखाना होगा। क्या हम में अपने भारत को पहचान कर भारतीय तरीके से भारतीय समाज बनाने का साहस है?