रविवार (१२ जून) को जब मैंने पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार में प्रवेश किया तो मन में स्वामी रामदेव के स्वास्थ्य को लेकर चिंता तो थी, पर साथ ही यह कामना भी थी की रामदेव जी (एक संन्यासी) ने इस अनशन को "आमरण अनशन" कहा है तो इस अनशन को तब तक समाप्त नहीं करना चाहिए जब तक सब मांगे मान नहीं ली जाती. इन दो विरोधाभासी विचारों के बीच ही मन कह रहा था कि बाबा रामदेव आज अनशन तोड़ देंगे, जिसका भरोसा श्री श्री रविशंकर एक दिन पहले जता चुके थे.
मेरे लिए हरिद्वार जाना एक महत्त्वपूर्ण निर्णय था. TCS में अपने काम को छोड़ कर निकलना मेरे बॉस राजेश ने कुछ आसान बना दिया, क्योंकि राजेश स्वयं एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं तथा दुनिया में चल रहे विभिन्न आन्दोलनों के प्रति अपना वैयक्तिक मत रखते हैं. मैंने जब हरिद्वार जाने का फैसला किया तो मुझे नहीं मालूम था कि यह आन्दोलन कितना लम्बा चलेगा, परन्तु मेरा निश्चय था कि विजय मिलने से पहले लौटूंगा नहीं. मेरी पत्नी आभा मेरे लम्बे समय तक आन्दोलन से जुड़ने के पक्ष में नहीं थी और मेरे पिताजी तो एक दिन के लिए भी जुड़ना परिवार व TCS के प्रति गैरजिम्मेदारी व बेवकूफी भरा निर्णय बता रहे थे. खैर, मैं पतंजलि योगपीठ पहुँच चुका था और उम्मीद कर रहा था कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध यह आन्दोलन भारत के लिए एक एतिहासिक क्षण ला पायेगा.
योगपीठ में यज्ञशाला नामक स्थान पर आन्दोलनकारियों व मीडियाकर्मियों के बैठने की व्यवस्था की गयी थी. कुल ५०-६० लोग रहे होंगे, जो टीवी के माध्यम से आन्दोलन की खबरें पा रहे थे. मेरे ख्याल से आन्दोलन के नेताओं को आन्दोलनकारियों से सीधा संवाद स्थापित करना चाहिए था. अनशन टूटने की खबर भी वहां टीवी के माध्यम से ही पहुंची, जो कि मेरी हरिद्वार यात्रा की पहली बड़ी निराशा थी. अनशन टूटना स्वयं एक बढ़ी निराशा थी ही.
खैर मुझे कुल मिला कर अपना हरिद्वार आना व्यर्थ लगा क्योंकि मैं समझ चुका था कि यह आन्दोलन अब कुछ समय के लिए तो अपनी ऊर्जा खो ही देगा. तभी मैंने अपने बॉस राजेश को इस आशय का सन्देश भेजा कि मेरी वापसी जल्द ही होगी. दोपहर के भोजन के बाद मैंने कईं कार्यकर्ताओं से बात कि और दो प्रश्न पूछे - (१) अनशन टूटने के बाद अब इस सत्याग्रह का अगला कदम क्या होगा?, (२) मैं आन्दोलन में योगदान देना चाहता हूँ, इसलिए मुझे स्वयंसेवकों के दल में शामिल होने के लिए क्या करना होगा? स्वयंसेवक के तौर पर मैंने सफाई से लेकर कंप्यूटर के किसी काम को करने के लिए अपनी तैयारी दिखाई. दोनों में से किसी भी प्रश्न का जवाब संतोषजनक नहीं मिला. मुझे आचार्य जी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के लौटने तक इंतज़ार करने कि सलाह दी गयी और खाली बैठने को कहा. शाम को आखिरकार अपने प्रयास में मुझे थोड़ी सफलता मिली जब मुझे यज्ञशाला के निकट कुर्सियां तरतीब से लगाने का काम दिया गया.
किसी को मालूम नहीं था कि स्वामी जी कब लौटेंगे, पर सब इंतज़ार कर रहे थे. योगपीठ के अन्य सब काम तथा आयुर्वेदिक अस्पताल अपना नियमित काम कर ही रहे थे. सोमवार का सारा समय इस इंतज़ार में बीता कि शायद स्वामी जी आ ही जाएँ. स्टार न्यूज़ के एक व्यक्ति से बात करके पता चला कि स्वामी जी के अगले दिन सुबह ही आने कि संभावना है. स्वयंसेवा के लिए कोई मौका न देख कर मैंने पुस्तकालय में २ घंटे बिताये. योगपीठ का पुस्तकालय काफी समृद्ध है और विशेषतः हिंदी भाषा की पुस्तकों की अच्छी collection है. उन पुस्तकों को देख कर अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गौरव का एहसास हुआ तथा मन किया की वहां बैठ कर गंभीर अध्ययन करूं. लेकिन मैं जानता था कि अध्ययन का मौका अभी नहीं है.
शाम को मुझे योगपीठ के फेस २ में राजीव भवन जाकर विनोद जी से मिलने को कहा गया. विनोद जी शायद सूचना तकनीकी के लिए वहां कुछ setup कर रहे हैं और मेरी पृष्ठभूमि को देखते हुए शायद यह सोचा गया होगा कि मैं वहां कुछ स्वयंसेवा कर सकूंगा. मैं तुरंत राजीव भवन पहुंचा, जो कि भारत स्वाभिमान के श्री राजीव दीक्षित कि पावन स्मृति में बनाया गया है. ये वही राजीव दीक्षित हैं, जिनके भाषणों को सुनने के लिए १९९८-९९ में हम मुंबई में घूमते थे और जिनकी राष्ट्रनिष्ठा और देशभक्ति से प्रेरणा पाते थे. विनोद जी से जब मैं मिला तो मैंने पाया कि उनके पास मुझे देने को कोई काम नहीं है. शाम का समय था, इसलिए उन्होंने कहा कि अगले दिन सुबह वो मुझे कुछ बता सकेंगे. मैंने कहा कि मैं रात को भी जो काम बोलेंगे, वो करने को तैयार हूँ, पर विनोद जी ने कहा कि अभी वो एक आवश्यक बैठक के लिए निकल रहे हैं, इसलिए सुबह ही बता पायेंगे. मैंने उनसे एक प्रार्थना और की कि भारत स्वाभिमान "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के मुद्दे पर जो कुछ काम कर रही है, मुझे उसकी जानकारी चाहिए. विनोद जी ने अगले दिन सुबह ९ बजे से पहले मुझे फोन पर बात करके दिशा दिखाने का भरोसा जताया और मेरा फोन नंबर ले लिया.
अगले दिन सुबह मुझे कोई फोन नहीं आया. पता लगा कि स्वामी जी हरिद्वार लौट आये हैं और ११:३० बजे के करीब दर्शन देंगे. मैं तुरंत यज्ञशाला पहुंचा कि शायद सत्याग्रह की भावी दिशा का पता लग सकेगा. वहां उस समय लगभग ४००-५०० लोग थे, तभी सूचना जारी हुई कि स्वामी जी अस्पताल के OPD हॉल में दर्शन देंगे. सुब लोग यज्ञशाला से निकल कर OPD हॉल में पहुंचे; मैं भी पहुंचा. इस पूरे समय में मैंने देखा कि यज्ञशाला के आसपास का जो तामझाम (टेंट, कुर्सियां, इत्यादि) था, उसे उठवाया जा रहा है. बाबा रामदेव कि प्रतीक्षा में हम बैठे थे, जब मंच से किसी ने घोषणा की कि सत्याग्रह जारी रहेगा और सब लोग अपने-अपने जिलों में लौट कर वहीँ से सत्याग्रह में भाग लें.
कोई १ घंटे की प्रतीक्षा के बाद स्वामी रामदेव पहुंचे. मैंने पहली बार उन्हें प्रत्यक्ष देखा था. शरीर से कमजोर, लेकिन चुस्त. चेहरे पर शांति व सौम्यता विराजमान थी. मंच पर पहुँच कर उन्होंने कुछ वरिष्ठ संतों के चरण छुए. कुछ अन्य संतों ने स्वामी जी के चरण छुए. स्वामी जी पर पुष्पवर्षा की गयी, और कार्यकर्ताओं ने "भारत माता की जय" और "वन्दे मातरम्" के नारों से माहौल गुंजा दिया. बिना कोई शब्द बोले स्वामी जी मंच से चले गए.
मुझे अभी भी सत्याग्रह की भावी दिशा का पता नहीं चला था. मैं वहां पहुंचा जहां से मीडिया के लोग रिपोर्ट कर रहे थे. कुछ लोगों में कैमरे के सामने खड़े होने की लालसा देखी, पर मैं दूर खड़ा हो कर सुनने की कोशिश कर रहा था कि क्या बताया जा रहा है. पता लगा कि सत्याग्रह को लेकर भ्रम की स्थिति है और ऐसी अफवाहें उड़ रही हैं कि स्वामी जी ने ८-१० दिन का मौन धारण किया है. मेरी इच्छा थी कि मैं मीडिया से पूछूं कि वो इस आन्दोलन के मुद्दों पर चर्चा करने की बजाय इस पर ध्यान क्यों लगा रहे हैं कि बाबा के पीछे कौन है, पर मैं अपने स्वयं के संकोच के कारण यह पूछ न पाया.
वहां से निपटने के बाद लगभग २ बजे मुझे एक ब्रह्मचारी मिले, जिन्होंने अपना जीवन बाबा की सेवा में समर्पित कर दिया है. उन्होंने बताया कि ऐसे लगभग १५० युवक-युवतियां हैं जिन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहते हुए भारत स्वाभिमान का काम करने की कसम खाई है. उन ब्रह्मचारी को जब मैंने बताया कि मुझे कुछ दिनों से सत्याग्रह की कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है, तो उन्होंने खेद प्रकट किया और कहा कि ऐसी व्यवस्था नहीं की जा सकी, जिस से मुझ जैसे लोगों को मार्गदर्शन दिया जा सके. "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के विषय में उनका कहना था कि सरकार को ही इस दिशा में पहल करनी होगी (जिस के बारे में मेरा मत कुछ भिन्न है). उन्होंने अपने एक सहयोगी को कहा कि मुझे स्वामी मुक्तानंद से मिलवा दे. उनके सहयोगी थोडा घबराये, जिस से मैंने अंदाजा लगाया कि स्वामी मुक्तानंद जी शायद काफी वरिष्ठ हैं. मैं उनके साथ स्वामी मुक्तानंद कि खोज में निकला. थोड़ी देर में भगवे वस्त्रों में एक स्वामी मिले, जो सब कार्यकर्ताओं को योगपीठ के फेस २ में जाने को कह रहे थे. बाद में पता चला कि वही स्वामी मुक्तानंद थे. मैं फटाफट से खाना खाकर फेस-२ में पहुंचा, इस उम्मीद में कि सब से वहीँ पर मुलाकात होगी. परन्तु दुर्भाग्य से मुझे फेस-२ में कोई नहीं दिखाई दिया. मैं राजीव भवन में जाकर बैठ गया तो वहीँ विनोद जी मिल गए. मैंने शालीनतावश उनसे सुबह ९ बजे फोन न करने का तकाजा नहीं किया, पर यह जरूर कहा कि "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के विषय पर स्पष्टता मिलने से पहले मैं वहां से नहीं लौटूंगा.
विनोद जी मुझे डॉ जयदीप आर्य के कार्यालय में ले गए. डॉ आर्य बाबा के बहुत नजदीकी सहयोगी हैं और मुझे विश्वास था कि वो मेरी सहायता अवश्य करेंगे. लेकिन उनके कार्यालय में एक अन्य सज्जन दिलीप जी बैठे थे, जो शायद कार्यालय को संभालने का काम करते हैं. वो स्वयं भी एक वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं. मैंने उनको अपनी सारी रामकहानी सुनायी, जो उन्होंने कुछ रूचि से व कुछ अरुचि से सुनी. उन्होंने भी यही कहा कि "भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा" के लिए सरकार को ही पहल करनी होगी. उसके बिना वो चाह कर भी कुछ नहीं कर सकेंगे. मैंने कहा कि जनता एवं भारत स्वाभिमान जैसे संगठन भी काफी कुछ कर सकते हैं, इसलिए सरकार के कुछ करने कि "प्रतीक्षा" करना शायद ठीक नहीं होगा, जैसे (१) अंग्रेजी को दिए जाने वाले स्पेशल treatment की खबरों को जनता तक ले जाना, (२) हिंदी में नए शब्द रचना, (३) हिंदी माध्यम में इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करने की दिशा गंभीर पहल करना, ये कुछ काम तुरंत शुरू किये जा सकते हैं. दिलीप जी ने मुझे लिखित में एक प्रोपोसल देने का सुझाव दिया और कहा कि मैं इसे डॉ आर्य को सीधे भेज सकता हूँ. डॉ आर्य से मिलने के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि वो स्वामी जी के साथ हैं क्योंकि बहुत से लोग मिलने आये हुए हैं.
इस बैठक के बाद Action point मेरे पास था - मुझे लिखित में एक प्रोपोसल भेजना है, जिसके लिए मुझे कुछ समय लगेगा. मैंने हरिद्वार से लौट कर इस पर काम करने का निश्चय किया. इस पूरी यात्रा में कईं बातें सीखी -
(१) एक संगठन के नेतृत्व और उसके साधारण कार्यकर्ताओं के बीच में सीधा संवाद स्थापित होना बेहद जरूरी है.
(२) आन्दोलनों में कुछ योगदान देने के लिए अचानक सब छोड़ कर निकलने से पहले पत्र-व्यवहार व स्थानीय स्तर पर कुछ योगदान देना बहुत कामगार साबित होता है.
(c) अच्छे नेताओं को शांत, संयमित होना चाहिए और बडबोलेपन से बचना चाहिए.
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17.6.11
3.4.08
हिन्दी में MBA, यानी बेहतर concepts?
भाई, आम तौर पर तो यही माना जाता है कि हिन्दी में MBA पढोगे तो देश विदेश में छपने वाले ज्ञान से वंचित भी रह जाओगे और नौकरी भी नहीं मिलेगी। लेकिन व्यवसायिक जगत शायद ऐसा नहीं मानता।
वर्धा के प्रसिद्ध विश्व विद्यालय ने जब हिन्दी भाषा में MBA शुरू की, तो पेंतालून के Managing Director किशोर बियानी जी ने कहा, "अपनी भाषा में शिक्षा पाना सदा ही अच्छा होता है। Concepts की समझ भी बेहतर बनती है। यदि पाठ्यक्रम अंग्रेजी में होने वाली MBA के बराबर का होगा तो ऐसे प्रत्याशियों के चयन में कोई समस्या नहीं आएगी"।
सामान्य जनों के लिए ये अनोखी बात हो सकती है। कुछ लोग इसे ऐसे लोगों की मूर्खता समझेंगे जो अपनी भाषा को आज भी पकड़ कर बैठे हैं और दुनिया की धारा से उलट चलने में अपनी ऊर्जा गँवा रहे हैं। कुछ लोग इस पर गर्व भी महसूस करेंगे। कुछ लोग इस घटना को भारतीय जनों की सिर्फ़ एक दबी हुई भावना की सुखद अभिव्यक्ति मानेंगे। किसी भी दृष्टि से इसको देखें, पर एक बात से कोई इनकार नही कर सकता कि ज्ञान और भाषा दो अलग अलग बातें हैं, और आज कल की अंधी दौड़ में ज्ञान और अंग्रेजी भाषा को एक ही बात मान लिया गया है। वर्धा विश्व विद्यालय का ये साहसिक कदम समाज में फैली हुई इस अवधारणा को दूर करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि उच्च शिक्षा सिर्फ़ अंग्रेजी में ही पायी जा सकती है।
वर्धा से पहले ही हैदराबाद के एक विश्व विद्यालय ने उर्दू माध्यम में MBA दी थी और उसके १००% छात्रों को नौकरी भी मिल गयी थी। ICICI के कार्पोरेट संचार समूह के मुखिया चारुदत्त देशपांडे जी का कहना है, "वित्त उद्योग में अंग्रेजी कि अनिवार्यता का कोई पवित्र नियम नहीं है। यहाँ पर सब अंकों (गणित) का काम है। यदि concepts स्पष्ट हैं तो नौकरियों में चयन में कोई समस्या नहीं होगी। वास्तव में front office कि नौकरियों के लिए तो स्थानीय भाषा में MBA पढने वाले लाभ की स्थिति में ही रहेंगे।"
पूरा समाचार यहाँ देखिये: http://www.dnaindia.com/report.asp?newsid=1156781&pageid=2
वर्धा के प्रसिद्ध विश्व विद्यालय ने जब हिन्दी भाषा में MBA शुरू की, तो पेंतालून के Managing Director किशोर बियानी जी ने कहा, "अपनी भाषा में शिक्षा पाना सदा ही अच्छा होता है। Concepts की समझ भी बेहतर बनती है। यदि पाठ्यक्रम अंग्रेजी में होने वाली MBA के बराबर का होगा तो ऐसे प्रत्याशियों के चयन में कोई समस्या नहीं आएगी"।
सामान्य जनों के लिए ये अनोखी बात हो सकती है। कुछ लोग इसे ऐसे लोगों की मूर्खता समझेंगे जो अपनी भाषा को आज भी पकड़ कर बैठे हैं और दुनिया की धारा से उलट चलने में अपनी ऊर्जा गँवा रहे हैं। कुछ लोग इस पर गर्व भी महसूस करेंगे। कुछ लोग इस घटना को भारतीय जनों की सिर्फ़ एक दबी हुई भावना की सुखद अभिव्यक्ति मानेंगे। किसी भी दृष्टि से इसको देखें, पर एक बात से कोई इनकार नही कर सकता कि ज्ञान और भाषा दो अलग अलग बातें हैं, और आज कल की अंधी दौड़ में ज्ञान और अंग्रेजी भाषा को एक ही बात मान लिया गया है। वर्धा विश्व विद्यालय का ये साहसिक कदम समाज में फैली हुई इस अवधारणा को दूर करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि उच्च शिक्षा सिर्फ़ अंग्रेजी में ही पायी जा सकती है।
वर्धा से पहले ही हैदराबाद के एक विश्व विद्यालय ने उर्दू माध्यम में MBA दी थी और उसके १००% छात्रों को नौकरी भी मिल गयी थी। ICICI के कार्पोरेट संचार समूह के मुखिया चारुदत्त देशपांडे जी का कहना है, "वित्त उद्योग में अंग्रेजी कि अनिवार्यता का कोई पवित्र नियम नहीं है। यहाँ पर सब अंकों (गणित) का काम है। यदि concepts स्पष्ट हैं तो नौकरियों में चयन में कोई समस्या नहीं होगी। वास्तव में front office कि नौकरियों के लिए तो स्थानीय भाषा में MBA पढने वाले लाभ की स्थिति में ही रहेंगे।"
पूरा समाचार यहाँ देखिये: http://www.dnaindia.com/report.asp?newsid=1156781&pageid=2
4.11.06
मेरा पीड़ादायक अनुभव
दिल्ली से डेनमार्क लौट आया हूं। अपने पुत्र विष्णु को पूर्वी दिल्ली के किसी अच्छे हिन्दी माध्यम विद्यालय में दाखिल करवाने का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाया। अपने घर के नजदीक वसुन्धरा एन्कलेव इलाके के सब विद्यालयों में घूमा, पर मुझे एक भी हिन्दी माध्यम विद्यालय नहीं मिला। सभी अंग्रेजी माध्यम में ही शिक्षा दे रहे हैं। नोएडा में प्रयास किया तो सैक्टर 12 में विद्या भारती द्वारा संचालित एक हिन्दी माध्यम विद्यालय मिला, लेकिन उसकी बस वसुन्धरा एन्कलेव में नहीं आती। मेरी पत्नी, जिसे दिल्ली में मेरी अनुपस्थिति में 2 महीने बिताने हैं, को हर रोज विष्णु को छोड़ने जाना बहुत असुविधाजनक हो जाता। इसलिए मन मार कर विष्णु को घर के नजदीक वसुन्धरा एन्कलेव में ही एक अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में दाखिला करवा दिया। विष्णु को होने वाली दिक्कतों का हमें भली भान्ति अन्दाजा है क्योंकि आज की तारीख में विष्णु को A, B, C, D के अतिरिक्त बिल्कुल अंग्रेजी नहीं आती। गिनती भी उसे हिन्दी में ही आती है। परन्तु कोई अन्य हल नहीं दिखाई दिया जिससे विष्णु की शिक्षा तुरन्त शुरू हो सके।
अपनी पीड़ा को शब्दों में कैसे बयान करूं? दिल्ली की गर्मी में बच्चों को टाई लगाकर विद्यालय जाते हुए देखना अपने आप में एक श्राप है। उस पर अंग्रेजी माध्यम से मिलने वाली अधकचरी शिक्षा किसी भी प्रकार मुझे अपने पुत्र के बारे में निश्चिन्त नहीं कर पा रही है।
विष्णु को तो अगले साल हिन्दी माध्यम के विद्यालय में ही भेजूंगा। साथ ही मैंने निश्चय किया है कि
1. ज्यादा से ज्यादा लोगों को मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने के लाभों से परिचित करवाऊंगा।
2. स्वयं एक उत्तम हिन्दी माध्यम विद्यालय की स्थापना करके एक उदाहरण प्रस्तुत करूंगा।
अपनी पीड़ा को शब्दों में कैसे बयान करूं? दिल्ली की गर्मी में बच्चों को टाई लगाकर विद्यालय जाते हुए देखना अपने आप में एक श्राप है। उस पर अंग्रेजी माध्यम से मिलने वाली अधकचरी शिक्षा किसी भी प्रकार मुझे अपने पुत्र के बारे में निश्चिन्त नहीं कर पा रही है।
विष्णु को तो अगले साल हिन्दी माध्यम के विद्यालय में ही भेजूंगा। साथ ही मैंने निश्चय किया है कि
1. ज्यादा से ज्यादा लोगों को मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने के लाभों से परिचित करवाऊंगा।
2. स्वयं एक उत्तम हिन्दी माध्यम विद्यालय की स्थापना करके एक उदाहरण प्रस्तुत करूंगा।
14.9.06
पूर्वी दिल्ली में हिन्दी माध्यम विद्यालय
आगामी अक्तूबर में मैं 3 सप्ताह के लिए भारत आ रहा हूं। इस यात्रा का एक मुख्य उद्देश्य है अपने पौने चार साल के बेटे विष्णु को किसी अच्छे हिन्दी माध्यम के विद्यालय में दाखिला दिलवाना। मेरी इच्छा यह है कि वो छ: महीने यानि अक्तूबर व मार्च के बीच में नर्सरी की पढ़ाई पूरी कर ले ताकि उसका एक वर्ष खराब न हो।
इस के लिए मुझे पूर्वी दिल्ली में एक अच्छे हिन्दी माध्यम विद्यालय की खोज है। अपने दिल्ली के रिश्तेदारों व मित्रों से कुछ खास जानकारी नहीं मिल पा रही है। आप में से किसी मित्र को इस बारे में कुछ जानकारी हो तो कृपया बताएं। मैं यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हो पा रहा हूं कि अब हिन्दी माध्यम में पढ़ाई करवाने के लिए मुझे अपने बेटे को दिल्ली के किसी दूसरे कोने में भेजना पड़ेगा।
क्या आप मदद कर सकते हैं?
इस के लिए मुझे पूर्वी दिल्ली में एक अच्छे हिन्दी माध्यम विद्यालय की खोज है। अपने दिल्ली के रिश्तेदारों व मित्रों से कुछ खास जानकारी नहीं मिल पा रही है। आप में से किसी मित्र को इस बारे में कुछ जानकारी हो तो कृपया बताएं। मैं यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हो पा रहा हूं कि अब हिन्दी माध्यम में पढ़ाई करवाने के लिए मुझे अपने बेटे को दिल्ली के किसी दूसरे कोने में भेजना पड़ेगा।
क्या आप मदद कर सकते हैं?
21.7.06
हिन्दी के साथ भेदभाव जारी है।
अंग्रेज गए १९४७ में, लेकिन न तो गुलामी की मानसिकता गई और न ही अंग्रेजियत नहीं गई। न जाने क्यों आज भी भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी से अपने अधिकार मांगने पड़ते हैं। लीजिये पढ़िये कुछ समाचार जो सामान्य समझ से परे हैं।
१॰ बंगाल में हिन्दी माध्यम से पढ़ाई तो होती है लेकिन परीक्षा में प्रश्न पत्र अंग्रेजी में मिलते हैं। विवरण यहां पढ़ें।
२॰ एक ऐसे देश में जहां ९५ प्रतिशत जनसंख्या अंग्रेजी नहीं जानती, वहां अंग्रेजी भाषा की शिक्षा इस कदर अनिवार्य है कि अंग्रेजी में फेल यानि सब में फेल। हालांकि सब जानते हैं कि भारत में अंग्रेजी जन सामान्य की भाषा नहीं बन सकती। कुछ समाचार (१) (२) (३)
३॰ क्या आप जानते हैं कि भारत में कम्पयूटर का प्रयोग कम होने के लिए कौन जिम्मेदार है? हमारे काबिल मन्त्री महोदय का मानना है कि माइक्रोसोफ्ट के उत्पादों की अधिक कीमतें इसके लिए जिम्मेदार हैं। वो ये तो स्वीकार करते हैं कि मात्र ५ प्रतिशत जनता ही अंग्रेजी जानती है, पर यह स्वीकार नहीं करते कि अंग्रेजी न जानने वाले लोग आज भी कम्पयूटरों का प्रयोग नहीं कर पाते। अगर कर लें तो समझ में आ जाएगा कि कम्पयूटरों का प्रयोग कम होने के लिए अंग्रेजियत की मानसिकता ही जिम्मेदार है जो भारत आज तक अपनी जनता को उनकी भाषा में कम्पयूटर उपलब्ध नहीं करवा पाया। पूरा विवरण यहां पढ़ें।
४॰ अंग्रेजी बोलने में समस्या है, पर बाकी सब कुछ आता है? तो क्या हुआ? स्कूल में दाखिला नहीं मिल सकता। पूरा विवरण यहां पढ़ें।
५॰ दवाओं की जानकारी स्थानीय भाषा में उपलब्ध नहीं। आज तक सिर्फ अंग्रेजी में ही लिखी यह जानकारी निकट भविष्य में शायद हिन्दी में भी उपलब्ध होने लगेगी। अन्य भाषाएं बोलने वाले लोग अब भी "पढ़े लिखों" पर निर्भर रहें। पूरा विवरण यहां पढ़ें।
१॰ बंगाल में हिन्दी माध्यम से पढ़ाई तो होती है लेकिन परीक्षा में प्रश्न पत्र अंग्रेजी में मिलते हैं। विवरण यहां पढ़ें।
२॰ एक ऐसे देश में जहां ९५ प्रतिशत जनसंख्या अंग्रेजी नहीं जानती, वहां अंग्रेजी भाषा की शिक्षा इस कदर अनिवार्य है कि अंग्रेजी में फेल यानि सब में फेल। हालांकि सब जानते हैं कि भारत में अंग्रेजी जन सामान्य की भाषा नहीं बन सकती। कुछ समाचार (१) (२) (३)
३॰ क्या आप जानते हैं कि भारत में कम्पयूटर का प्रयोग कम होने के लिए कौन जिम्मेदार है? हमारे काबिल मन्त्री महोदय का मानना है कि माइक्रोसोफ्ट के उत्पादों की अधिक कीमतें इसके लिए जिम्मेदार हैं। वो ये तो स्वीकार करते हैं कि मात्र ५ प्रतिशत जनता ही अंग्रेजी जानती है, पर यह स्वीकार नहीं करते कि अंग्रेजी न जानने वाले लोग आज भी कम्पयूटरों का प्रयोग नहीं कर पाते। अगर कर लें तो समझ में आ जाएगा कि कम्पयूटरों का प्रयोग कम होने के लिए अंग्रेजियत की मानसिकता ही जिम्मेदार है जो भारत आज तक अपनी जनता को उनकी भाषा में कम्पयूटर उपलब्ध नहीं करवा पाया। पूरा विवरण यहां पढ़ें।
४॰ अंग्रेजी बोलने में समस्या है, पर बाकी सब कुछ आता है? तो क्या हुआ? स्कूल में दाखिला नहीं मिल सकता। पूरा विवरण यहां पढ़ें।
५॰ दवाओं की जानकारी स्थानीय भाषा में उपलब्ध नहीं। आज तक सिर्फ अंग्रेजी में ही लिखी यह जानकारी निकट भविष्य में शायद हिन्दी में भी उपलब्ध होने लगेगी। अन्य भाषाएं बोलने वाले लोग अब भी "पढ़े लिखों" पर निर्भर रहें। पूरा विवरण यहां पढ़ें।
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