21.7.06

हिन्दी के साथ भेदभाव जारी है।

अंग्रेज गए १९४७ में, लेकिन न तो गुलामी की मानसिकता गई और न ही अंग्रेजियत नहीं गई। न जाने क्यों आज भी भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी से अपने अधिकार मांगने पड़ते हैं। लीजिये पढ़िये कुछ समाचार जो सामान्य समझ से परे हैं।
१॰ बंगाल में हिन्दी माध्यम से पढ़ाई तो होती है लेकिन परीक्षा में प्रश्न पत्र अंग्रेजी में मिलते हैं। विवरण यहां पढ़ें।
२॰ एक ऐसे देश में जहां ९५ प्रतिशत जनसंख्या अंग्रेजी नहीं जानती, वहां अंग्रेजी भाषा की शिक्षा इस कदर अनिवार्य है कि अंग्रेजी में फेल यानि सब में फेल। हालांकि सब जानते हैं कि भारत में अंग्रेजी जन सामान्य की भाषा नहीं बन सकती। कुछ समाचार () () ()
३॰ क्या आप जानते हैं कि भारत में कम्पयूटर का प्रयोग कम होने के लिए कौन जिम्मेदार है? हमारे काबिल मन्त्री महोदय का मानना है कि माइक्रोसोफ्ट के उत्पादों की अधिक कीमतें इसके लिए जिम्मेदार हैं। वो ये तो स्वीकार करते हैं कि मात्र ५ प्रतिशत जनता ही अंग्रेजी जानती है, पर यह स्वीकार नहीं करते कि अंग्रेजी न जानने वाले लोग आज भी कम्पयूटरों का प्रयोग नहीं कर पाते। अगर कर लें तो समझ में आ जाएगा कि कम्पयूटरों का प्रयोग कम होने के लिए अंग्रेजियत की मानसिकता ही जिम्मेदार है जो भारत आज तक अपनी जनता को उनकी भाषा में कम्पयूटर उपलब्ध नहीं करवा पाया। पूरा विवरण यहां पढ़ें।
४॰ अंग्रेजी बोलने में समस्या है, पर बाकी सब कुछ आता है? तो क्या हुआ? स्कूल में दाखिला नहीं मिल सकता। पूरा विवरण यहां पढ़ें।
५॰ दवाओं की जानकारी स्थानीय भाषा में उपलब्ध नहीं। आज तक सिर्फ अंग्रेजी में ही लिखी यह जानकारी निकट भविष्य में शायद हिन्दी में भी उपलब्ध होने लगेगी। अन्य भाषाएं बोलने वाले लोग अब भी "पढ़े लिखों" पर निर्भर रहें। पूरा विवरण यहां पढ़ें।

2 टिप्‍पणियां:

मिर्ची सेठ ने कहा…

मुकेश जी

परिचर्चा से आपके बारे में पता चला। मैं अम्बाला से हूँ व पिछले कई सालों से सैनहोज़े में कार्यरत हूँ। लिखते रहिए।

पंकज

अनुनाद सिंह ने कहा…

वाह! कितना बढिया तरीके से समस्या को संक्षेप में किन्तु प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है!